“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
जब विश्वास टूटने लगता है
…उस अनजान फ़ोन कॉल को आए हुए अब लगभग एक सप्ताह बीत चुका था।
ऊपर से सब कुछ पहले जैसा ही दिखाई देता था।
आदित्य रोज़ समय पर कार्यालय जाता।
अनामिका विद्यालय।
परी स्कूल से लौटकर होमवर्क करती, फिर शाम को बगीचे में खेलती।
पड़ोसियों की नज़र में वर्मा परिवार अब भी एक आदर्श परिवार था।
लेकिन घर की दीवारें जानती थीं कि मुस्कानों के पीछे अब खामोशी रहने लगी थी।
और खामोशी…
अक्सर सबसे ख़तरनाक आवाज़ होती है।
उस शाम आदित्य सामान्य दिनों से लगभग एक घंटा पहले घर लौट आया।
मुख्य द्वार खुला था।
अंदर से अनामिका की हँसी सुनाई दे रही थी।
वह एक पल के लिए ठिठक गया।
उसे लगा, घर में कोई मेहमान होगा।
धीरे-धीरे वह बैठक की ओर बढ़ा।
अंदर केवल अनामिका और परी थीं।
दोनों फ़र्श पर बैठकर कैरम खेल रही थीं।
परी ज़ोर-ज़ोर से हँस रही थी।
“मम्मी… आपने फिर चीटिंग की!”
अनामिका भी खिलखिला पड़ी।
“अरे! इसे चीटिंग नहीं… अनुभव कहते हैं।”
दरवाज़े पर खड़े आदित्य को देखकर दोनों चुप हो गईं।
“अरे! आज इतनी जल्दी?”
अनामिका ने मुस्कराकर पूछा।
“काम खत्म हो गया था।”
उसने संक्षिप्त उत्तर दिया।
“चाय बना दूँ?”
“हूँ…”
बस इतना ही।
न मुस्कान।
न अपनापन।
न कोई सामान्य बातचीत।
अनामिका ने उसकी आँखों में झाँका।
उसे साफ़ महसूस हो रहा था कि कुछ तो बदल गया है।
लेकिन क्या?
यह वह समझ नहीं पा रही थी।
रात के भोजन के बाद आदित्य बालकनी में खड़ा था।
आकाश में बादल छाए थे।
हल्की हवा चल रही थी।
अनामिका उसके पास आकर खड़ी हो गई।
“कुछ दिनों से तुम बहुत बदल गए हो।”
आदित्य चुप रहा।
“ऑफिस में कोई परेशानी है?”
“नहीं।”
“तो फिर?”
आदित्य ने पहली बार उसकी ओर देखा।
“तुम्हारे स्कूल में नए शिक्षक आए हैं न?”
अनामिका मुस्करा दी।
“हाँ… अभिषेक।”
“कैसे हैं?”
“अच्छे हैं। बच्चों को संगीत सिखाने का तरीका भी बढ़िया है।”
“तुम दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई?”
अनामिका ने हल्की हँसी के साथ कहा—
“अरे! अभी तो उन्हें आए एक हफ़्ता भी नहीं हुआ।”
लेकिन यह हँसी आदित्य को अच्छी नहीं लगी।
उसे लगा जैसे उसकी पत्नी किसी और के नाम पर मुस्करा रही है।
“तुम्हें उनकी बातें बड़ी अच्छी लगती हैं।”
अनामिका का चेहरा गंभीर हो गया।
“आदित्य… आखिर कहना क्या चाहते हो?”
“कुछ नहीं।”
“नहीं। कुछ तो है।”
“मैंने कहा ना… कुछ नहीं।”
कहकर वह भीतर चला गया।
अनामिका देर तक बालकनी में खड़ी रही।
उसे पहली बार महसूस हुआ—
जिस आदमी ने कभी उस पर आँख बंद करके विश्वास किया था…
वही अब उससे नज़रें चुराने लगा था।
अगले दिन विद्यालय में वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयारी चल रही थी।
अभिषेक हारमोनियम पर बच्चों को सुर समझा रहे थे।
एक बच्ची बार-बार गलती कर रही थी।
अनामिका मुस्कराते हुए उसके पास पहुँची।
“डरना मत… संगीत में गलती नहीं होती, केवल अभ्यास कम होता है।”
बच्ची मुस्करा दी।
अभिषेक ने प्रभावित होकर कहा—
“आप बच्चों से बहुत धैर्य से बात करती हैं।”
“बच्चे डाँट से नहीं… विश्वास से सीखते हैं।”
दोनों की यह बातचीत प्रधानाचार्य के कमरे के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में रिकॉर्ड हो रही थी।
एक सामान्य बातचीत…
जिसका कोई विशेष महत्व नहीं था।
लेकिन उसी समय विद्यालय के सामने सड़क किनारे खड़ी कार में बैठा आदित्य कैमरे से नहीं…
अपनी आँखों से दृश्य देख रहा था।
उसे दिखाई दिया—
अभिषेक कुछ कह रहे हैं।
अनामिका मुस्करा रही है।
फिर दोनों साथ-साथ स्टाफ रूम की ओर चले गए।
बस…
इतना ही।
लेकिन आदित्य के भीतर कहानी कुछ और बन चुकी थी।
उसने मुट्ठियाँ भींच लीं।
“मैं बेवकूफ़ नहीं हूँ…”
वह बुदबुदाया।
उस रात उसने एक नया निर्णय लिया।
अब केवल मोबाइल देखना पर्याप्त नहीं था।
उसे “सच” जानना था।
अगले ही दिन उसने इंटरनेट से एक छोटा-सा जीपीएस ट्रैकर मँगवाया।
साथ ही एक स्पाई ऐप भी डाउनलोड किया, जिससे मोबाइल की लोकेशन देखी जा सकती थी।
पार्सल दो दिन बाद आया।
रात को जब सब सो गए, आदित्य चुपचाप नीचे उतरा।
उसने अनामिका के स्कूटर की डिक्की खोली।
ट्रैकर भीतर चिपका दिया।
फिर वापस कमरे में आकर ऐसे सो गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
उसे लगा—
अब कोई सच उससे छिप नहीं सकेगा।
लेकिन वह नहीं जानता था कि दूसरों पर नज़र रखने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी ही सोच का कैदी बन जाता है।
इधर परी पिछले कुछ दिनों से घर का बदलता माहौल महसूस कर रही थी।
उस रात उसने अपनी माँ से पूछा—
“मम्मी…”
“हाँ बेटा?”
“क्या पापा अब आपसे नाराज़ रहते हैं?”
अनामिका ने मुस्कराने की कोशिश की।
“नहीं… बस ऑफिस का तनाव है।”
“लेकिन पहले तो वे आपको देखकर मुस्कराते थे।”
यह सुनकर अनामिका की आँखें भर आईं।
उसने परी को सीने से लगा लिया।
“कुछ रिश्तों में मौसम बदल जाते हैं, बेटा… लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्यार खत्म हो गया।”
परी ने मासूमियत से पूछा—
“तो क्या बारिश के बाद फिर धूप निकल आएगी?”
अनामिका ने जवाब नहीं दिया।
क्योंकि उसके पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं था।
उसी रात…
घर के सभी लोग सो चुके थे।
लेकिन बैठक में रखे आदित्य के लैपटॉप की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
कुछ सेकंड बाद उस पर एक ईमेल आया।
प्रेषक (Sender): Unknown
विषय: “क्या तुम सच जानने के लिए तैयार हो?”
आदित्य ने काँपते हाथों से ईमेल खोला।
उसमें केवल एक पंक्ति लिखी थी—
“कल दोपहर ठीक 1:15 बजे… अपनी पत्नी का पीछा करना। तुम्हें वह दिखाई देगा, जिस पर तुम कभी विश्वास नहीं करोगे।”
ईमेल पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
उसे क्या पता था…
कि अगले दिन दोपहर 1:15 बजे जो कुछ वह देखने वाला था…
वह उसकी पूरी ज़िंदगी की दिशा बदल देगा।
(क्रमश:)
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