आजकल का रोबोटिक एआई जो भावों को उड़ाकर घाव देता है!
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
आजकल का दौर बड़ा अजीब है। पहले लोग “कहने से पहले सोचते” थे, अब “ट्वीट करने के बाद डरते” हैं। और डर किससे? किसी इंसान से नहीं… बल्कि एक अदृश्य, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान सत्ता से—जिसे हम प्यार से “ट्विटर की नीति” कहते हैं।
और यह नीति इम्प्लीमेंट करता है ट्विटर का रोबोटिक एआई यानी आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस! यह आजकल ट्वीट किए जा रहे शब्दों या चित्रों का गलत मतलब निकालकर अपना ही मजाक उड़वा रहा है! ऐसा करने के पीछे उसकी मंशा यही रहती है कि कथित गलती करने वाला बस यह कह दे कि “सॉरी! गलती से ट्वीट हो गया!!”
ट्विटर पर एक सज्जन ने लिखा—
“आज चाय बहुत अच्छी बनी है ☕😊”
अब भला इसमें क्या आपत्तिजनक हो सकता है?
लेकिन ट्विटर का AI बोला—“चाय? कहीं यह किसी वर्ग विशेष का प्रतीक तो नहीं? Suspicious!”
और बस… ट्वीट गायब!
दूसरी तरफ, एक महानुभाव ने लिखा—
“सब बेकार हैं, कोई काम का नहीं!”
और यह ट्वीट आराम से ट्रेंड कर रहा है… हजारों लाइक्स के साथ!
वाह री नीति! जो मीठा बोले, वो कट जाए… और जो कड़वा बोले, वो छप जाए!
अब ज़रा एक महिला यूज़र की कहानी सुनिए।
उन्होंने बड़े सलीके से लिखा—
“महिलाओं को आत्मनिर्भर बनना चाहिए, अपने सपनों को पूरा करना चाहिए।”
बस, इतना कहना था कि ट्विटर का AI चौंक पड़ा—
“ओह! यह तो Gender Discussion है… Potentially Sensitive!”
और ट्वीट को “सीमित दृश्यता” में डाल दिया गया।
वहीं दूसरी ओर, कोई बेहूदा कमेंट करता है—
“अरे, ये सब दिखावा है!”
और ट्विटर कहता है—“यह तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।”
अरे भाई! ये कैसी स्वतंत्रता है, जिसमें सम्मानित शब्द कैद हो जाते हैं और अपमानित शब्द आज़ाद घूमते हैं?
हमारा देश आज “महिला सशक्तिकरण” की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। बेटियाँ उड़ान भर रही हैं, महिलाएँ हर क्षेत्र में नाम कमा रही हैं। लेकिन ट्विटर का हाल देखिए—
जैसे कोई कह रहा हो—“आप आगे बढ़िए, लेकिन ज़रा संभलकर… कहीं आपकी तारीफ भी हमें गलत न लग जाए!”
एक महिला ने लिखा—
“मैं एक गृहिणी हूँ और मुझे इस पर गर्व है।”
अब इसमें क्या गलत है?
लेकिन ट्विटर ने सोचा—“यह तो Role Stereotyping हो सकता है!”
और फिर वही कहानी—सीमित पहुँच!
अब सवाल यह है कि क्या हर शब्द के पीछे कोई छुपा हुआ षड्यंत्र ढूँढना ज़रूरी है?
क्या हर भावना को “नीति के चश्मे” से ही देखना होगा?
कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि ट्विटर खुद एक व्यंग्य बन गया है—
जहाँ “सामाजिक मुद्दों” की बात करने वाले ही सबसे पहले कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं।
कोई लिखे—“पेड़ बचाओ 🌳”
तो ट्विटर सोचे—“क्या यह किसी औद्योगिक नीति के खिलाफ है?”
और कोई लिखे—“सब खत्म कर दो!”
तो ट्विटर बोले—“यह तो रूपक (metaphor) है!”
सच कहें तो यह दोहरी नीति अब हास्यास्पद से ज्यादा चिंताजनक लगने लगी है।
एक तरफ “Freedom of Expression” का झंडा उठाया जाता है,
और दूसरी तरफ उसी स्वतंत्रता को एल्गोरिद्म की जंजीरों में जकड़ दिया जाता है।
लेकिन… हर व्यंग्य का एक सकारात्मक अंत भी होना चाहिए।
हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में ट्विटर का AI थोड़ा और “मानवीय” बनेगा।
वह केवल शब्द नहीं, भावनाएँ भी समझेगा।
वह केवल नियम नहीं, विवेक भी अपनाएगा।
क्योंकि असली बुद्धिमत्ता (Intelligence) वही है—
जो सही और गलत के बीच फर्क कर सके,
और सच्ची अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित कर सके।
शायद एक दिन ऐसा आए—
जब ट्विटर पर कोई महिला गर्व से लिखे—
“मैं अपने सपनों को जी रही हूँ”
और ट्विटर कहे—
“👏 प्रेरणादायक! इसे और लोगों तक पहुँचाना चाहिए!” तब जाकर यह मंच सच में “सोशल मीडिया” कहलाएगा—
जहाँ समाज जुड़ेगा, टूटेगा नहीं…
जहाँ शब्दों का सम्मान होगा, दमन नहीं…
और जहाँ AI सिर्फ आर्टिफिशियल नहीं,
बल्कि “असली इंसानियत” से भरा होगा।
(डिस्क्लेमर: यह एआई जनित काल्पनिक रचना है जिसका मकसद एआई की खामियां बताना है और अभिव्यक्ति की आजादी व महिला सशक्तिकरण जैसी इंसानी भावनाओं की रक्षा करना है।)
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