“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…वह दृश्य जिसने सब कुछ बदल दिया
अगली सुबह आदित्य की आँखें अलार्म बजने से पहले ही खुल गईं।
रात भर वह सो नहीं पाया था। बार-बार उसकी नज़र मोबाइल पर चली जाती, जहाँ वह रहस्यमय ईमेल अब भी खुला हुआ था।
“दोपहर 1:15 बजे… अपनी पत्नी का पीछा करना।”
ईमेल भेजने वाले का कोई नाम नहीं था। न कोई ईमेल पता, न कोई पहचान। साइबर सुरक्षा का विशेषज्ञ होने के बावजूद आदित्य उस संदेश का स्रोत नहीं खोज पाया था। यह बात उसे भीतर तक बेचैन कर रही थी।
क्या कोई उसके परिवार पर नज़र रख रहा था?
या…
कोई उसे किसी जाल में फँसा रहा था?
उसने तय कर लिया—
आज वह सच जानकर ही रहेगा।
सुबह का माहौल सामान्य था।
अनामिका ने हमेशा की तरह नाश्ता बनाया।
परी स्कूल जाने की तैयारी कर रही थी।
“पापा…”
परी मुस्कराई।
“आज शाम जल्दी आना। मेरी कविता प्रतियोगिता की प्रैक्टिस करानी है।”
आदित्य ने बेटी के सिर पर हाथ रखा, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं आ सकी।
“हाँ… कोशिश करूँगा।”
अनामिका ने ध्यान से उसे देखा।
“सब ठीक है?”
“हाँ।”
“यकीन?”
“हाँ।”
इतना कहकर वह जल्दी से बाहर निकल गया।
अनामिका देर तक दरवाज़े पर खड़ी उसे जाते हुए देखती रही।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पति को खो रही है…
या वह पहले ही खो चुकी है।
दोपहर के लगभग बारह बजे आदित्य ने ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ले ली।
उसने कार विद्यालय से कुछ दूरी पर खड़ी कर दी।
उसकी नज़र लगातार स्कूल के मुख्य द्वार पर थी।
घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं।
1:10…
1:12…
1:14…
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
और फिर…
1:15।
विद्यालय का मुख्य द्वार खुला।
सबसे पहले कुछ बच्चे बाहर निकले।
फिर दो-तीन शिक्षक।
और उनके पीछे…
अनामिका।
उसके साथ अभिषेक भी था।
दोनों धीरे-धीरे बातें करते हुए सड़क की ओर बढ़ रहे थे।
आदित्य ने कार का शीशा थोड़ा नीचे किया।
दूरी अधिक थी।
आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।
केवल दृश्य दिखाई दे रहा था।
अभिषेक ने कुछ कहा।
अनामिका हँस पड़ी।
फिर दोनों सड़क पार कर सामने बने एक छोटे-से कैफ़े की ओर बढ़ गए।
आदित्य की मुट्ठियाँ अपने-आप भींच गईं।
“तो… यह सच है!”
उसने गाड़ी स्टार्ट की और कुछ दूरी बनाकर उनका पीछा करने लगा।
कैफ़े का नाम था—
“सुर-संगम कैफ़े।”
यह संगीत प्रेमियों की छोटी-सी बैठक जैसा स्थान था।
दीवारों पर पुराने गायकों की तस्वीरें टँगी थीं।
अंदर धीमी आवाज़ में शास्त्रीय संगीत बज रहा था।
अनामिका और अभिषेक खिड़की के पास वाली मेज़ पर बैठ गए।
आदित्य ने सड़क के उस पार अपनी कार रोक दी।
वहाँ से शीशे के पार दोनों साफ़ दिखाई दे रहे थे।
वेटर ने कॉफी रखी।
दोनों बातें कर रहे थे।
एक क्षण बाद…
अभिषेक ने अपने बैग से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।
उसे मेज़ पर रख दिया।
आदित्य की साँस जैसे रुक गई।
“गिफ्ट?”
उसके भीतर का संदेह अब विश्वास का रूप लेने लगा।
उसे लगा—
अब सब कुछ स्पष्ट है।
अनामिका ने डिब्बा खोला।
उसके चेहरे पर आश्चर्य उभरा।
फिर वह मुस्कराई।
अगले ही पल…
उसने हाथ बढ़ाकर अभिषेक का हाथ हल्के से पकड़ लिया।
बस…
इतना-सा दृश्य।
लेकिन आदित्य के लिए यही अंतिम प्रमाण था।
उसकी आँखों के सामने जैसे अँधेरा छा गया।
क्रोध, अपमान, अविश्वास…
सब एक साथ उसके भीतर फट पड़े।
उसने कार का दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।
वह अंदर जाकर सबके सामने सच्चाई उजागर कर देना चाहता था।
लेकिन तभी…
उसका मोबाइल बज उठा।
वही अज्ञात नंबर।
उसने तुरंत कॉल उठाई।
दूसरी ओर वही बदली हुई आवाज़ थी।
“अभी अंदर मत जाना।”
आदित्य दहाड़ पड़ा—
“तुम हो कौन?”
“अगर पूरी सच्चाई जाननी है…
तो केवल देखो।
कुछ मत करो।”
“तुम मेरे परिवार के बारे में इतना सब कैसे जानते हो?”
कुछ क्षण सन्नाटा रहा।
फिर दूसरी ओर से धीमी आवाज़ आई—
“क्योंकि…
मैं पिछले कई महीनों से तुम्हारे परिवार पर नज़र रख रहा हूँ।”
कॉल कट गया।
आदित्य के हाथ काँपने लगे।
उसने फिर कैफ़े की ओर देखा।
अभिषेक अब वह डिब्बा वापस बैग में रख रहा था।
अनामिका मुस्कराते हुए कुछ कह रही थी।
कुछ मिनट बाद दोनों बाहर निकले।
सड़क पर आते ही अभिषेक ने हाथ जोड़कर विदा ली और दूसरी दिशा में चला गया।
अनामिका अपने स्कूटर की ओर बढ़ गई।
आदित्य ने फिर उसका पीछा किया।
लेकिन रास्ते में जो हुआ…
उसने उसके मन में उठे तूफ़ान को और भी भयावह बना दिया।
अनामिका सीधे घर नहीं गई।
वह शहर के पुराने हिस्से में स्थित एक संकरी गली में मुड़ गई।
वहाँ एक छोटा-सा मकान था, जिसके बाहर जंग लगा हुआ लोहे का गेट था।
उसने स्कूटर रोका।
चारों ओर देखा।
और भीतर चली गई।
आदित्य ने दूर खड़ी कार से उस मकान को ध्यान से देखा।
दरवाज़े पर कोई नाम-पट्टिका नहीं थी।
खिड़कियाँ बंद थीं।
पूरा मकान वर्षों से वीरान लगता था।
“वह यहाँ क्यों आई है?”
उसके मन में प्रश्नों का ज्वार उठने लगा।
लगभग बीस मिनट बाद अनामिका बाहर निकली।
उसके हाथ में अब कोई डिब्बा नहीं था।
चेहरे पर गंभीरता थी।
वह बिना इधर-उधर देखे स्कूटर स्टार्ट कर घर की ओर चली गई।
आदित्य कार से उतरा।
उसने मकान के बंद दरवाज़े तक जाकर घंटी बजाई।
कोई उत्तर नहीं मिला।
उसने दोबारा घंटी बजाई।
फिर भी सन्नाटा।
तभी पीछे से एक बूढ़े चौकीदार की आवाज़ सुनाई दी—
“बेटा… किसे ढूँढ़ रहे हो?”
आदित्य ने उस मकान की ओर इशारा किया।
“यहाँ कौन रहता है?”
बूढ़ा कुछ क्षण उसे देखता रहा।
फिर बोला—
“अजीब बात है…
उस मकान में तो पिछले दो साल से कोई नहीं रहता।“
आदित्य के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने एक बार फिर उस बंद मकान की ओर देखा…
**अगर वहाँ कोई नहीं रहता…
तो अनामिका अभी-अभी अंदर किससे मिलकर आई थी?**
उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमक उठीं।
उसे यह बिल्कुल पता नहीं था…
कि उसने जिस रहस्य का दरवाज़ा खटखटाया है…
उसके पीछे केवल एक विवाह का संकट नहीं…
बल्कि कई वर्षों से दफ़न एक ऐसा सच छिपा है, जो अनेक ज़िंदगियाँ बदलने वाला था।
(क्रमश:)
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