“राखी का धागा सिर्फ़ कलाई नहीं बाँधता, सपनों को भी सहारा देता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
रक्षाबंधन का दिन था।
शहर की सबसे बड़ी हवेली आज फूलों और रोशनियों से सजी थी। घर में चहल-पहल थी, लेकिन मीरा का मन बार-बार उस कच्ची पगडंडी की ओर जा रहा था, जहाँ उसका छोटा भाई मोहन रहता था।
मीरा और मोहन एक ही माँ की संतान थे, मगर किस्मत ने दोनों के जीवन अलग-अलग रंगों में रंग दिए थे। मीरा की शादी एक सम्पन्न परिवार में हुई थी। बड़ा घर, गाड़ियाँ, नौकर-चाकर—उसकी ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। मोहन गाँव में छोटी-सी किराने की दुकान चलाता था। आमदनी इतनी ही थी कि घर का चूल्हा जलता रहे।
हर साल की तरह इस बार भी मोहन अपनी बहन से राखी बंधवाने शहर आया था।
“दीदी, राखी बाँध दो,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
मीरा ने उसकी कलाई पर राखी बाँधी। रोली का टीका लगाया और आरती उतारते हुए उसकी आँखें भर आईं।
“हमेशा खुश रहना, मोहन।”
मोहन ने सिर झुका लिया।
राखी बंध गई थी, मगर उसके मन में एक चिंता लगातार चुभ रही थी।
उपहार!
वह जानता था कि बहन के घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। उसे डर था कि कहीं मीरा के ससुराल वाले उसके मामूली उपहार को देखकर उसका मज़ाक न उड़ाएँ। वह अपनी बहन के लिए कुछ अच्छा लाना चाहता था, मगर जेब में इतने ही पैसे थे कि वापसी का किराया और घर का राशन निकल सके।
मीरा ने उसके चेहरे की झिझक पढ़ ली।
“क्या हुआ? इतने चुप क्यों हो?”
“कुछ नहीं दीदी…”
“मुझसे झूठ?”
मोहन की आँखें झुक गईं।
“दीदी… इस बार मैं आपके लिए कुछ नहीं ला पाया।”
मीरा कुछ क्षण उसे देखती रही। फिर मुस्कुराकर उसके हाथ अपने हाथों में ले लिए।
“तुम्हें लगता है, मुझे तुमसे उपहार चाहिए?”
मोहन चुप रहा।
मीरा ने धीरे से कहा—
“मोहन, आज मैं तुम्हें एक उपहार देना चाहती हूँ। लेकिन ऐसा उपहार, जो तुम्हारी ज़िंदगी बदल सकता है।”
मोहन ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
मीरा ने अपने बैग से एक लिफाफा निकाला और उसके हाथ में रख दिया।
“यह क्या है?”
“तुम्हारी दुकान के सामने वाली खाली जगह याद है?”
“हाँ…”
“वहाँ तुम एक छोटी-सी पुस्तक और स्टेशनरी की दुकान खोलो। तुम्हारे गाँव के बच्चों को पढ़ने के लिए दूर शहर नहीं जाना पड़ेगा। मैं शुरुआती पूँजी दे रही हूँ। दुकान तुम्हारी होगी, मेहनत तुम्हारी होगी और कमाई भी तुम्हारी।”
मोहन अवाक् रह गया।
“लेकिन दीदी… इतना पैसा…”
मीरा ने उसकी बात रोक दी।
“इसे राखी का उपहार मत समझना। इसे मेरी तरफ़ से तुम्हारे आत्मसम्मान में लगाया गया निवेश समझना।”
मोहन की आँखों से आँसू बह निकले।
मीरा ने उसकी कलाई पर बंधी राखी को देखते हुए कहा—
“भाई का मतलब सिर्फ़ बहन की रक्षा करना नहीं होता, मोहन। कभी-कभी बहन को भी भाई के सपनों की रक्षा करनी पड़ती है।”
मोहन ने काँपते हाथों से लिफाफा पकड़ लिया।
फिर अचानक वह बच्चे की तरह हँस पड़ा।
“दीदी! अब मेरे गाँव के बच्चे किताबें खरीदने शहर नहीं जाएँगे!”
उसकी आँखों में आँसू थे, चेहरे पर मुस्कान थी और दिल में एक नया सपना।
मीरा ने उसे गले लगा लिया।
उस दिन मोहन अपनी बहन के घर से कोई महँगा उपहार लेकर नहीं लौटा।
वह उससे कहीं अधिक कीमती चीज़ लेकर लौटा था—
अपने पैरों पर खड़े होने का विश्वास।
और उसकी कलाई पर बंधी राखी जैसे कह रही थी—
रिश्ते तब सबसे खूबसूरत होते हैं, जब उनमें देने वाला बड़ा और पाने वाला छोटा नहीं होता… बस प्यार बड़ा होता है।
(AI GENERATED CREATION)
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