“गुरु गढ़ता है भविष्य, शिष्य बनाता है राष्ट्र।”
सुनीता कुमारी , विज्ञान शिक्षिका, बैंगलोर
नए भारत की नई पीढ़ी तीव्र गति से प्रत्येक क्षेत्र में अग्रसर हो रही है पर मेरे मन में एक भय है ,क्षोभ है। जिसे मैं अग्र लिखित वाक्यों में पूरा करना चाहूँगी। प्रत्येक बच्चा अबोध ,अनजान ,कोमल अपने माता-पिता के साथ रोते या हँसते अपनी प्रथम पाठशाला परिवार, की पाठ से ओतप्रोत होकर दूसरी पाठशाला अर्थात स्कूल में जब कदम रखता है। वह अनजान,अजनबी,बालक विद्यार्थी कहलाता है ।
वह बच्चा मानो गुलाब की कली की
तरह होता है जो गुणों से लबालब भरा होता है ,पर उसके पास गुणों को परखने की कला ,नहीं होती है ,जिस तरह से
हीरे को कोयले की खान से निकालकर ,तराशा जाता है।ठीक उसी प्रकार शिक्षक छात्रों को हीरे की तरह तराशता है।
शिक्षक कुम्हार की तरह भी होता है,जो कच्ची मिट्टी रूपी विद्यार्थी को आकार तथा आयाम देता है तथा वर्तमान,भविष्य
की बिना चिंता किए आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। बच्चों के अंदर सुषुप्त गुणों को जागृत करता है,और उसे परिवार
,समाज के साथ-साथ बाहर की दुनिया में विचरण करवाता है। चाहे वह वायुमंडल की उड़ान हो,स्थलमंडल की दौड़
हो,या जल मंडल में डुबकी लगाना हो आदि ज्ञान से विद्यार्थियों अपने आप को सभी वातावरण में जीना सीख लेते हैं और
अपना ज्ञान को प्रदर्शित कर अपने परिवार, समाज तथा देश -दुनिया का भविष्य बनाते
हैं।शिक्षक नए-नए सजीव उत्पाद (प्रोडक्ट)उत्पन्न करते
हैं। एक शिक्षक अपने जीवन काल में लाखों सजीव प्रोडक्ट या उत्पाद तैयार करते हैं।यह लाखों सजीव उत्पादक कई करोड़
लोगों में रोजगार का सृजन करते हैं। यह कला एक शिक्षक की ही हो सकती है।
प्रश्न है ,क्या यह कला एक दिन की है ? नहीं ,यह
कई सालों की क्रमागत परिश्रम से उत्पन्न ,उपचार ,अध्ययन से प्रेरित होता है। विद्यार्थी की सफलता कोई जादू की छड़ी
नहीं है जिसे घुमाने मात्र से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। बल्कि हर दिन उठाए गए छोटे-छोटे
क़दमों का परिणाम है। मेरा मानना है कि हर विद्यार्थी अपने आप में अनमोल है, अद्वितीय है। माता- पिता अपने बच्चों की
तुलना किसी और से न करें। हरआदमी की क्षमता अलग होती। यूनिक होती है।
शिक्षक का संक्षिप्त परिचय सटिक शब्दों में कुछ इस प्रकार है –
जल जाता है वो दिए की तरह ,
कई जीवन रौशन कर गुरु,
अपना फर्ज निभाता है।
जिस तरह से भारत पुरानी परंपराओं का देश है, ठीक उसी प्रकार जापान भी एक पुरानी परंपराओं वाला देश है
जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जा रहा है। यहाँ शिक्षा तथा शिक्षक दोनों को विशेष सम्मान प्राप्त है।वहाँ एक दिन का
सम्मान ,शिक्षक दिवस के रूप में नहीं मनाया जाता है।उनका मानना है कि शिक्षक का सम्मान कालांतर तक मिलने वाला
सम्मान है। शिक्षक -छात्र संबंध बहुत ही अटूट है।जापान में शिक्षकों को अच्छी सुविधा व्यवस्था है,उन्हें देश के निर्माता के
रूप में माना जाता है।उनकी आमदनी भी अच्छी है, जिसके कारण देश के विकास में वह स्तंभ का काम करती है, तभी
जापान की अर्थव्यवस्था विश्व में तीसरी अर्थव्यवस्था है ।
जिस तरह से हमारे देश के संविधान में अनेक देशों के अच्छे-अच्छे अनुच्छेदों को लाकर बनाया गया है।उसी तरह
से मैं अपने देश के छात्रों से यही कहना चाहूँगी कि कहीं से भी अच्छी बुद्धि,विवेक को सीखा जा सकता है और उसका पूर्ण
प्रयोग कर अपने देश तथा ज्ञान देने वाली उपदेष्टा का सम्मान करने की आवश्यकता है।जिससे आपके अंदर माँ सरस्वती
,जो विद्या की देवी है,विराजमान रहेंगी और आपके जीवन को सहज बनाएँगी ।
सच्चा शिक्षक अपने शिष्य को सदा ऊंँचाई पर देखना चाहता है, अर्थात अपने से ऊपर। शिक्षक और विद्यार्थी का संबंध,
विश्वास ,आदर और मार्गदर्शन पर आधारित एक पवित्र और अनूठा बंधन है।
“शिष्य की सफलता उसके गुरु की
काबिलियत की परिचय देती है”।
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