“पहला कवि सम्मेलन ही आख़िरी क्यों बना—कविता कम, कवियों का तमाशा ज़्यादा!”
पंकज शर्मा “तरुण “, मंदसौर (मध्य प्रदेश )
…सबसे अजीब बात यह थी कि हर कवि अपनी बारी जल्दी आ जाने हेतु कुछ न कुछ बहाना बना कर कविता पाठ करने माइक पर जम जाता जब तक लोग बाल नहीं नोचने लगते तब तक वह अपनी
रचनाएं! पेलता रहता!हालांकि इन कवियों में कुछ उम्दा कवि भी थे, उन कवियों से जो इधर उधर की फूहड़ बातें कर उनको अपनी श्रेष्ठ रचनाएं कहते नहीं थक रहे थे!बीच- बीच में चाय के दौर भी आए।
यह चक्र सुबह ढाई बजे तक चलता रहा, मेरी कमर बैठे बैठे कमान बन चुकी थी।दो बजे किसी भले कवि ने मेरी दयनीय स्थिति को देख कर सिफारिश की कि संचालक महोदय शर्मा जी को अवसर दे दो!वह संचालक मेरी ओर देख कर बोला पूरा नाम बताओ?मैने बड़े इतराते हुए कहा ख़ाकसार को बीच में किसी ने मेरा नाम बताया तो मैं जी कह कर शांत हो गया!!
जिन कवि महाशय ने मुझ पर यह कृपा बरसाई थी वे मुझे वे ऐसे लगे जैसे साक्षात धर्मराज युधिष्ठिर हों!!मैने अपने दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम कर आभार माना।
माइक पकड़ कर अपने दोहा छंदों को सस्वर प्रस्तुत किया।यूं लगा जैसे सभी कवि मेरे काव्य पाठ से प्रसन्न नहीं थे!क्यों कि तुकबंदी के आदी कवि इस आदि अर्थात कबीर दास जी, तुलसी दास जी के जमाने के दोहों को शायद पचा नहीं पा रहे थे।मैने अपने अल्प समय का सदुपयोग कर बैठने में ही अपनी भलाई समझी।
छंद बद्ध काव्य रचनाओं को शायद आज के तथाकथित कवि शायद पसंद नहीं करते!न श्रोता! क्योंकि उन्हें भद्दे ,भौंडे चुटकुले सुनने की आदत जो हो चुकी है!!मन में यह भी विचार आया कि शायद मेरे जीवन का यह अंतिम कवि सम्मेलन ही साबित होगा!!
(काल्पनिक रचना)
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