“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
संदेह का पहला बीज
…सुबह का वह फ़ोन कॉल केवल कुछ सेकंड का था, लेकिन उसने आदित्य वर्मा के मन में ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया था, जो आने वाले महीनों में उसके पूरे जीवन को निगल जाने वाला था।
“अगर सच जानना चाहते हो… तो अपनी पत्नी पर नज़र रखना।”
ये शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहे थे।
उसने कई बार उस नंबर पर दोबारा कॉल किया।
हर बार वही उत्तर मिला—
“यह नंबर अस्तित्व में नहीं है।”
आदित्य ने मोबाइल मेज़ पर रख दिया, लेकिन उसका मन अब किसी काम में नहीं लग रहा था।
रसोई में अनामिका अब भी गुनगुना रही थी—
“लग जा गले…”
वह वर्षों से यही करती आई थी। घर में संगीत घोल देना उसकी आदत थी।
लेकिन आज…
पहली बार आदित्य को उसकी आवाज़ भी बनावटी लगी।
उसने स्वयं को झटका।
“नहीं… मैं पागल नहीं हूँ। किसी ने शायद मज़ाक किया होगा।”
लेकिन मन इतनी आसानी से मानने वाला नहीं था।
ऑफिस पहुँचकर भी उसका ध्यान बार-बार मोबाइल पर जा रहा था।
कंप्यूटर स्क्रीन पर कोड खुला था, लेकिन उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर स्थिर थीं।
तभी उसके सहकर्मी और मित्र करण ने कुर्सी खिसकाते हुए पूछा—
“क्या बात है? आज बड़े परेशान लग रहे हो।”
आदित्य मुस्कराने की कोशिश करते हुए बोला—
“कुछ नहीं… बस नींद कम हुई।”
करण ने हँसते हुए कहा—
“देख भाई, ज़िंदगी में दो चीज़ों पर शक मत करना—अपनी किस्मत और अपनी पत्नी। दोनों पर शक करोगे तो चैन कभी नहीं मिलेगा।”
करण तो मज़ाक करके आगे बढ़ गया।
लेकिन उसके शब्द आदित्य के भीतर उतर गए।
“क्या सचमुच…?”
उसने सिर झटक दिया।
उधर विद्यालय में सुबह की प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी।
अनामिका बच्चों को संगीत सिखा रही थी।
उसकी मधुर आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।
“सा… रे… ग… म…”
बच्चे भी उसी उत्साह से सुर मिलाने का प्रयास कर रहे थे।
इसी बीच विद्यालय के प्रधानाचार्य एक नए शिक्षक को लेकर भीतर आए।
“बच्चो, ये हैं अभिषेक त्रिपाठी। आज से हमारे विद्यालय में संगीत विभाग में सहयोग करेंगे।”
लगभग पैंतीस वर्ष का अभिषेक विनम्र मुस्कान के साथ सभी से मिला।
उसने अनामिका की ओर हाथ बढ़ाया।
“नमस्ते मैडम। उम्मीद है, आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।”
अनामिका ने सहज मुस्कान के साथ उत्तर दिया—
“स्वागत है।”
बस इतना ही।
एक सामान्य परिचय।
जिसमें कोई असामान्य बात नहीं थी।
लेकिन उसी क्षण विद्यालय के बाहर सड़क के दूसरी ओर खड़ी एक कार के भीतर बैठा व्यक्ति दूरबीन से यह दृश्य देख रहा था।
वह आदित्य था।
ऑफिस जाने के बहाने वह यहाँ चला आया था।
उसने देखा—
अभिषेक मुस्करा रहा है।
अनामिका भी मुस्करा रही है।
उसने दूरबीन नीचे रख दी।
उसके मन ने वही देखा, जो वह देखना चाहता था।
संदेह को कभी प्रमाण नहीं चाहिए होते।
वह मुस्कुराहटों में भी अपराध खोज लेता है।
शाम को अनामिका घर लौटी तो हमेशा की तरह उसने चाय बनाई।
“आज स्कूल कैसा रहा?”
आदित्य ने सामान्य स्वर में पूछा।
“अच्छा। आज नए संगीत शिक्षक आए हैं।”
आदित्य का दिल एक पल को तेज़ धड़क उठा।
“अच्छा?”
“हाँ। उनका नाम अभिषेक है। बहुत विनम्र हैं। बच्चों के साथ भी जल्दी घुल-मिल गए।”
अनामिका सहज भाव से बोलती रही।
लेकिन आदित्य अब उसके हर शब्द का अलग अर्थ निकाल रहा था।
“बहुत तारीफ़ कर रही हो उनकी।”
अनामिका ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
“तारीफ़? मैंने तो सिर्फ़ परिचय बताया।”
“तुम्हें तो कोई भी अच्छा लग जाता है।”
“आदित्य!”
उसने हल्की नाराज़गी से कहा।
“आज तुम्हें हुआ क्या है?”
आदित्य ने तुरंत बात बदल दी।
“कुछ नहीं।”
लेकिन उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
रात लगभग ग्यारह बजे।
अनामिका सो चुकी थी।
आदित्य धीरे से उठा।
उसने सावधानी से उसका मोबाइल उठाया।
स्क्रीन लॉक नहीं था।
उसने एक-एक चैट पढ़नी शुरू की।
स्कूल की शिक्षिकाएँ…
परिवार…
माँ…
परी की क्लास टीचर…
सब कुछ सामान्य था।
फिर उसे एक नया नंबर दिखाई दिया।
अभिषेक।
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उसने चैट खोली।
पहला संदेश—
“कल बच्चों की रिहर्सल दस बजे रख लें?”
दूसरा—
“जी ठीक है।”
तीसरा—
“धन्यवाद मैडम।”
बस…
यही तीन संदेश।
कोई प्रेम नहीं।
कोई निजी बात नहीं।
कुछ भी नहीं।
लेकिन आदित्य ने राहत की साँस नहीं ली।
उसने सोचा—
“अगर सब कुछ इतना ही सामान्य है… तो फोन करने वाले ने मुझे चेतावनी क्यों दी?”
उसने मोबाइल वापस रख दिया।
उसे पता नहीं था कि उसी समय कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी छोटी-सी परी सब देख रही थी।
धीरे से उसने पूछा—
“पापा… आप मम्मी का फोन क्यों देख रहे थे?”
आदित्य चौंक पड़ा।
“तुम अभी तक जाग रही हो?”
“पानी पीने आई थी।”
वह कुछ क्षण चुप रहा।
फिर बोला—
“बस… ऐसे ही।”
परी मासूमियत से मुस्कराई।
“मम्मी कहती हैं कि बिना पूछे किसी की चीज़ नहीं देखनी चाहिए।”
यह सुनकर आदित्य के चेहरे पर एक अजीब-सा भाव उभरा।
उसे लगा जैसे एक आठ साल की बच्ची ने उसके भीतर छिपे अपराध को पकड़ लिया हो।
उस रात…
आदित्य देर तक छत की ओर देखता रहा।
नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।
उसे बार-बार वही अनजान आवाज़ सुनाई दे रही थी—
“अगर सच जानना चाहते हो… तो अपनी पत्नी पर नज़र रखना।”
उसे बिल्कुल पता नहीं था…
कि यह फोन कॉल केवल उसके मन में संदेह नहीं बो रहा था।
यह किसी बहुत बड़ी साज़िश की पहली चाल थी…
और उस साज़िश का असली खिलाड़ी अभी तक कहानी में आया भी नहीं था।
(क्रमश:)