“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
जो दिखाई देता है… वह हमेशा सच नहीं होता
“मैंने अपनी पत्नी की हत्या नहीं की है, माननीय न्यायालय।”
पूरा न्यायालय जैसे एक पल के लिए थम गया।
कटघरे में खड़ा लगभग चालीस वर्ष का आदित्य वर्मा बिना किसी घबराहट के न्यायाधीश की ओर देख रहा था। उसके चेहरे पर न अपराधबोध था, न बेचैनी और न ही भय। ऐसा लगता था मानो वह किसी अदालत में नहीं, बल्कि अपने कार्यालय में किसी तकनीकी प्रस्तुति के दौरान खड़ा हो।
सरकारी वकील ने अपनी ऐनक ठीक करते हुए तीखे स्वर में पूछा—
“तो क्या आप यह कहना चाहते हैं कि आपकी पत्नी की हत्या किसी अदृश्य व्यक्ति ने की?”
आदित्य ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि जिस समय मेरी पत्नी की हत्या हुई, उस समय मैं दूसरी मंज़िल पर अपने कंप्यूटर पर काम कर रहा था। उस समय मेरी प्रोजेक्ट फ़ाइल सेव हुई थी। उसके डिजिटल रिकॉर्ड इसकी पुष्टि करेंगे।”
अदालत में बैठे पत्रकारों की उँगलियाँ तेजी से नोटबुक पर चलने लगीं।
“कंप्यूटर बनेगा हत्या का गवाह!”
शायद अगले दिन की सुर्खियाँ कुछ ऐसी ही होने वाली थीं।
सरकारी वकील मुस्कराया।
“अर्थात आपका सबसे बड़ा गवाह… आपका कंप्यूटर है?”
“जी।”
एक क्षण के लिए न्यायालय में फिर सन्नाटा छा गया।
पीछे दर्शक दीर्घा में बैठा एक साधारण-सा व्यक्ति लगातार आदित्य को देख रहा था।
सफेद सूती कमीज़…
हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी…
चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं…
वह न पत्रकार था, न वकील और न ही पुलिस अधिकारी।
कम-से-कम वहाँ उपस्थित किसी व्यक्ति को ऐसा ही लगता था।
लेकिन सच्चाई कुछ और थी।
वह देश की एक अत्यंत गोपनीय जाँच इकाई का अधिकारी था।
उसका नाम था— विनोद।
उसने धीरे-से अपने होंठों में बुदबुदाया—
“कंप्यूटर कभी झूठ नहीं बोलता…
लेकिन कंप्यूटर का इस्तेमाल करने वाला इंसान… बोल सकता है।”
उसकी आँखें अब भी आदित्य पर टिकी थीं।
उसे अनुभव से पता था कि कुछ अपराधी घबराकर गलती करते हैं, जबकि कुछ अपराधी अपनी शांति से ही संदेह पैदा कर देते हैं।
आदित्य दूसरी श्रेणी का व्यक्ति था।
वह आवश्यकता से अधिक शांत था।
और यही बात विनोद को बेचैन कर रही थी।
न्यायाधीश ने अगली सुनवाई की तिथि घोषित की और हथौड़ा बजा दिया।
लोग धीरे-धीरे अदालत से बाहर निकलने लगे।
आदित्य को पुलिसकर्मी वापस ले जा रहे थे।
उसी समय उसकी नज़र एक पल के लिए दर्शक दीर्घा में बैठे विनोद से मिली।
सिर्फ दो सेकंड…
लेकिन उन दो सेकंड में मानो दोनों ने एक-दूसरे को पढ़ने की कोशिश की।
आदित्य की आँखों में एक क्षण के लिए हल्की-सी बेचैनी तैर गई।
विनोद मुस्करा दिया।
बहुत हल्की…
लगभग अदृश्य मुस्कान।
जैसे उसने कोई ऐसी बात देख ली हो, जो किसी और की नज़र में नहीं आई थी।
तीन महीने पहले…
भोपाल के शांत और प्रतिष्ठित आवासीय क्षेत्र में स्थित दो मंज़िला मकान बाहर से किसी आदर्श परिवार का घर प्रतीत होता था।
सुबह-सुबह बगीचे में खिले चमेली के फूलों की सुगंध वातावरण में घुल जाती थी।
बरामदे में रखे झूले पर अक्सर आठ वर्ष की परी अपनी गुड़ियों के साथ खेलती दिखाई देती।
घर के भीतर से मधुर स्वर में कोई पुराना गीत सुनाई देता।
वह आवाज़ थी—
अनामिका वर्मा की।
सरकारी विद्यालय में संगीत शिक्षिका।
सादा स्वभाव।
मधुर वाणी।
और चेहरे पर हमेशा रहने वाली शांत मुस्कान।
रसोई से आवाज़ आई—
“परी… जल्दी आओ। आज तुम्हारे पसंद के आलू के पराँठे बने हैं।”
“आई मम्मी!”
छोटी-सी परी दौड़ती हुई रसोई में पहुँची और माँ से लिपट गई।
उधर बैठक में बैठे आदित्य वर्मा अख़बार पढ़ रहे थे।
देश की एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में वरिष्ठ सॉफ़्टवेयर इंजीनियर।
संगठित जीवन।
अनुशासनप्रिय स्वभाव।
और हर काम समय पर करने की आदत।
पहली नज़र में कोई भी कह सकता था—
यह एक सुखी परिवार है।
लेकिन…
हर चमकती हुई सतह के नीचे अँधेरा नहीं दिखता।
कुछ अँधेरे इतने गहरे होते हैं कि वे मुस्कुराहटों के पीछे छिपे रहते हैं।
उस सुबह भी ऐसा ही हुआ।
नाश्ते की मेज़ पर बैठते ही आदित्य का मोबाइल बजा।
उसने स्क्रीन देखी…
चेहरा अचानक बदल गया।
कॉल रिसीव करते ही उसने केवल एक वाक्य सुना—
“अगर सच जानना चाहते हो… तो अपनी पत्नी पर नज़र रखना।”
इसके पहले कि वह कुछ पूछ पाता…
फोन कट चुका था।
आदित्य कई सेकंड तक मोबाइल स्क्रीन को देखता रह गया।
अनामिका ने सहज स्वर में पूछा—
“किसका फोन था?”
आदित्य ने उसकी ओर देखा।
पहली बार…
उसकी आँखों में विश्वास नहीं…
संदेह दिखाई दिया।
और उसी क्षण…
बिना किसी को पता चले…
एक खुशहाल परिवार की नींव में पहली दरार पड़ चुकी थी।
(क्रमश:)
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