(AI GENERATED CREATION)
Table Of Content
“सोच बदली, साधन बदले और इतिहास बदल गया।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
इस तैयारी का परिणाम यह हुआ कि पर्दे पर गांधी केवल वेशभूषा से गांधी नहीं लगते; उनके चलने, बैठने, बोलने और मौन रहने के तरीके में भी एक अलग व्यक्तित्व दिखाई देता है।
फ़िल्म की सफलता में इस अभिनय की बड़ी भूमिका रही। 1983 के ऑस्कर समारोह में गांधी को 11 नामांकन मिले और उसने 8 पुरस्कार जीते, जिनमें सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता शामिल थे।
300,000 लोगों वाला वह ऐतिहासिक दृश्य
फ़िल्म के सबसे अविश्वसनीय दृश्यों में गांधीजी की अंतिम यात्रा का दृश्य है।
इस दृश्य के लिए 3 लाख से अधिक लोगों के शामिल होने की बात Guinness World Records दर्ज करता है। इनमें 2 लाख से अधिक स्वयंसेवक थे, जबकि 94,560 अनुबंधित कलाकार थे। शूटिंग 31 जनवरी 1981 को हुई—गांधीजी की वास्तविक अंतिम यात्रा की 33वीं बरसी पर।
और आश्चर्यजनक बात यह है कि इतने विशाल दृश्य को बनाने के लिए 11 कैमरा दलों ने लगभग 20,000 फ़ीट फ़िल्म शूट की, लेकिन अंतिम फ़िल्म में उसका उपयोग केवल लगभग 125 सेकंड के दृश्य के रूप में हुआ।
यह आँकड़ा हमें सिनेमा की भव्यता तो बताता ही है, साथ ही यह भी दिखाता है कि किसी ऐतिहासिक क्षण को पर्दे पर विश्वसनीय बनाने के लिए कितनी बड़ी तैयारी की गई थी।
फ़िल्म की सफलता के पीछे बड़ा जोखिम
आज किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर करोड़ों रुपये खर्च करके फ़िल्म बनाना सामान्य बात लग सकती है। लेकिन गांधीजी पर इतनी बड़ी अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म बनाना आसान निर्णय नहीं था।
फ़िल्म का उत्पादन बजट लगभग 2.2 करोड़ डॉलर था और दुनिया भर में इसकी कमाई लगभग 12.78 करोड़ डॉलर दर्ज की गई।
रिचर्ड एटनबरो स्वयं बताते थे कि निर्माताओं के सामने एक सवाल था—लोग ऐसी फ़िल्म क्यों देखने आएँगे जिसमें एक साधारण कपड़े पहने व्यक्ति दिखाई देता है?
लेकिन यही कथित ‘जोखिम’ अंततः फ़िल्म की पहचान बना।
गांधी का सकारात्मक चिंतन: समस्या नहीं, प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण
गांधीजी के विचारों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे परिस्थितियों को नियंत्रित करने की बजाय अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने पर बल देते थे।
उनका एक प्रसिद्ध कथन है:
“कमज़ोर कभी क्षमा नहीं कर सकता; क्षमा बलवान का गुण है।”
यह कथन Young India में 2 अप्रैल 1931 को प्रकाशित हुआ था।
इस विचार को सकारात्मक सोच के संदर्भ में देखें तो इसका अर्थ है—क्रोध, बदले और नफ़रत को अपने ऊपर शासन न करने देना।
क्षमा का अर्थ अन्याय को सही मान लेना नहीं है। बल्कि गांधीजी के विचार में क्षमा एक ऐसी आंतरिक शक्ति हो सकती है, जिसमें व्यक्ति प्रतिक्रिया करने की क्षमता रखते हुए भी हिंसा को अपना रास्ता नहीं बनाता।
गांधीजी से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध विचार है—
“मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।”
भारत सरकार के एक प्रकाशन में भी इस कथन को गांधीजी के जीवन-दर्शन के सार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस एक वाक्य को गांधी फ़िल्म की पूरी संरचना की कुंजी माना जा सकता है।
(क्रमश:)
No Comment! Be the first one.