“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
… मौत की पहली चाल
राघव के मोबाइल की स्क्रीन अभी भी जल रही थी।
वीडियो समाप्त हो चुका था, लेकिन कमरे में ऐसा सन्नाटा पसरा था मानो समय स्वयं ठहर गया हो।
आदित्य की नज़र बार-बार उसी काली एसयूवी पर जा रही थी, जो दुर्घटना से ठीक पहले सड़क किनारे दिखाई दी थी।
वह कोई संयोग नहीं था।
किसी ने उस हादसे की पूरी योजना बनाई थी।
और अब…
वही लोग उसके परिवार के पीछे थे।
राघव ने मोबाइल बंद किया और कुर्सी पर बैठ गया।
उसके माथे पर पसीने की महीन बूँदें चमक रही थीं।
“आदित्य…”
उसने धीमे स्वर में कहा,
“आज से तुम अकेले कहीं नहीं जाओगे।”
“और परी?”
“उसे भी स्कूल से कुछ दिन की छुट्टी दिला दो।”
“लेकिन क्यों?”
राघव ने गंभीर नज़रों से उसकी ओर देखा।
“क्योंकि जिन्होंने बीस साल पहले एक पुलिस अधिकारी को मरवा दिया…
वे तुम्हें मारने में एक पल भी नहीं लगाएँगे।”
उसी शाम आदित्य घर पहुँचा।
उसने पहली बार महसूस किया कि कोई उसका पीछा कर रहा है।
रीयर-व्यू मिरर में एक काली एसयूवी लगातार दिखाई दे रही थी।
वह दाएँ मुड़ता…
एसयूवी भी मुड़ती।
वह रफ़्तार बढ़ाता…
वह भी तेज़ हो जाती।
आदित्य ने अचानक कार एक भीड़भाड़ वाले बाज़ार में घुसा दी।
सड़क पर ट्रैफ़िक बढ़ गया।
कुछ मिनट बाद जब उसने फिर शीशे में देखा…
एसयूवी गायब थी।
उसने राहत की साँस ली।
लेकिन यह राहत केवल कुछ मिनटों की थी।
घर पहुँचते ही परी दौड़कर उससे लिपट गई।
“पापा!”
“हाँ, मेरी गुड़िया?”
“कल मेरी कविता प्रतियोगिता है। आप आओगे ना?”
आदित्य ने बेटी को सीने से लगा लिया।
उसकी आँखें अनायास भर आईं।
“ज़रूर आऊँगा।”
अनामिका रसोई से बाहर आई।
उसने महसूस किया कि आदित्य असामान्य रूप से परेशान है।
“सब ठीक है?”
“हमें बात करनी है।”
“अभी?”
“हाँ… अभी।”
दोनों बरामदे में आकर बैठ गए।
रात गहरी होती जा रही थी।
आसमान में बादल छाए थे।
आदित्य ने बिना भूमिका बाँधे कहा—
“हम ख़तरे में हैं।”
अनामिका चौंक उठी।
“क्या मतलब?”
आदित्य ने पूरी बात बता दी—
राघव…
सीलबंद फ़ाइल…
धमकी…
परी की तस्वीर…
और वह वीडियो।
अनामिका का चेहरा धीरे-धीरे सफेद पड़ने लगा।
उसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया।
“नहीं…”
“तुम्हें कुछ पता है, है ना?”
अनामिका ने आँखें बंद कर लीं।
“मैं…”
“अब भी चुप रहोगी?”
कुछ देर बाद उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“मैं तुम्हें बचाना चाहती थी…”
“किससे?”
“…अपने अतीत से।”
उसी समय बाहर किसी गाड़ी के अचानक ब्रेक लगाने की तेज़ आवाज़ आई।
दोनों चौंककर उठे।
आदित्य दौड़कर मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा।
बाहर सड़क पर कोई नहीं था।
सिर्फ़ एक काला लिफ़ाफ़ा पड़ा था।
उसने सावधानी से उसे उठाया।
भीतर एक पेन ड्राइव थी।
और एक कागज़।
उस पर लाल स्याही से लिखा था—
“अब भी समय है…
सच जानना बंद कर दो।”
आदित्य तुरंत लैपटॉप लेकर बैठ गया।
पेन ड्राइव लगाई।
एक ही वीडियो फ़ाइल थी।
उसने प्ले बटन दबाया।
स्क्रीन पर धुँधली रिकॉर्डिंग दिखाई दी।
तारीख़—
तीन महीने पहले।
वीडियो किसी सीसीटीवी कैमरे का था।
स्थान—
वही पुराना वीरान मकान।
आदित्य की साँसें रुक गईं।
वीडियो में दरवाज़ा खुला।
अंदर…
अनामिका दाखिल हुई।
कुछ सेकंड बाद…
एक लगभग सत्तर वर्ष का बूढ़ा व्यक्ति सामने आया।
सफेद बाल।
कमज़ोर शरीर।
चेहरे पर घनी दाढ़ी।
वह काँपते हुए अनामिका के सामने खड़ा था।
अचानक…
वह आदमी रोने लगा।
उसने दोनों हाथ जोड़ दिए।
और अगले ही पल…
अनामिका उसके पैरों पर गिर पड़ी।
दोनों एक-दूसरे को गले लगाकर रो रहे थे।
वीडियो में आवाज़ नहीं थी।
केवल दृश्य था।
लगभग पाँच मिनट बाद…
वह बूढ़ा आदमी अलमारी से एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा निकालकर अनामिका को देता दिखाई दिया।
यही वही डिब्बा था…
जो आदित्य ने कुछ दिन पहले कैफ़े में अभिषेक के हाथों देखा था।
वीडियो यहीं समाप्त हो गया।
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
आदित्य ने धीरे-धीरे स्क्रीन से नज़र हटाई।
उसकी आवाज़ भारी हो चुकी थी।
“यह बूढ़ा कौन है?”
अनामिका की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने उत्तर देने की कोशिश की…
लेकिन शब्द गले में अटक गए।
“बोलो!”
आदित्य लगभग चिल्ला पड़ा।
कई क्षणों की चुप्पी के बाद…
अनामिका ने टूटे हुए स्वर में कहा—
“वह… मेरे पिता हैं।”
आदित्य जैसे पत्थर का हो गया।
“क्या?”
“लेकिन…”
“तुमने तो कहा था…”
“मेरे माता-पिता की मृत्यु बचपन में हो गई थी।”
अनामिका फूट-फूटकर रो पड़ी।
“मैंने झूठ कहा था…”
“क्यों?”
उसने सिर झुका लिया।
“क्योंकि…
अगर किसी को पता चल जाता कि वे ज़िंदा हैं…
तो उन्हें भी मार दिया जाता।”
यह सुनते ही आदित्य के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
तो इसका अर्थ था—
अनामिका के माता-पिता जीवित थे।
वह बूढ़ा व्यक्ति उसके पिता थे।
लेकिन…
फिर वह वीरान मकान?
झूठी पहचान?
सीलबंद फ़ाइल?
नंदिनी?
और सबसे बड़ा प्रश्न—
कौन उन्हें मारना चाहता था?
आदित्य कुछ और पूछ पाता, उससे पहले ही बाहर ज़ोरदार धमाका हुआ।
धड़ाम…!!
घर की सारी खिड़कियाँ हिल उठीं।
परी डरकर चीख पड़ी।
आदित्य बाहर भागा।
मुख्य गेट के ठीक सामने उसकी कार आग की लपटों में घिरी हुई थी।
किसी ने उसमें विस्फोटक लगाकर उड़ा दिया था।
आसपास के लोग घरों से बाहर निकल आए।
लपटें आसमान छू रही थीं।
उसी आग की रोशनी में सड़क के दूसरे छोर पर…
एक काली एसयूवी कुछ क्षणों के लिए दिखाई दी।
उसकी पिछली सीट पर बैठा एक व्यक्ति खिड़की का शीशा थोड़ा नीचे करके जलती हुई कार को देख रहा था।
चेहरा अँधेरे में छिपा था।
लेकिन जाते-जाते उसने हाथ उठाकर…
मानो आदित्य को सलाम किया।
और अगले ही पल…
एसयूवी अंधेरे में गायब हो गई।
आदित्य समझ चुका था—
अब यह केवल रहस्य नहीं रहा था।
शिकार की शुरुआत हो चुकी थी।
(क्रमश:)
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