“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…सीलबंद फ़ाइल का रहस्य
राघव के कार्यालय में एक अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई थी।
आदित्य अब तक अपने मित्र को एक निडर पुलिस अधिकारी के रूप में जानता था। लेकिन आज उसके चेहरे पर जो भय था, वह बनावटी नहीं हो सकता था।
राघव ने कमरे का दरवाज़ा भीतर से बंद किया, फिर खिड़की के पर्दे भी खींच दिए।
“अब बताओ…” आदित्य ने धीमे स्वर में कहा, “आख़िर इस तस्वीर में ऐसा क्या है?”
राघव ने तस्वीर को एक बार फिर देखा।
उसने लंबी साँस ली।
“मैं तुम्हें सब कुछ नहीं बता सकता… क्योंकि मुझे भी पूरी सच्चाई नहीं पता। लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि यह मामला कभी साधारण गुमशुदगी का नहीं था।”
“मतलब?”
“करीब बीस साल पहले शहर में लगातार तीन बच्चे रहस्यमय ढंग से गायब हुए थे।”
आदित्य चौंक गया।
“तीन?”
“हाँ… लेकिन अख़बारों में केवल एक बच्ची—नंदिनी—की ख़बर छपी। बाकी दोनों मामलों को दबा दिया गया।”
“क्यों?”
राघव ने कंधे उचकाए।
“यही तो आज तक कोई नहीं जान पाया।”
“क्या उन बच्चों का कभी पता चला?”
“नहीं।”
“और नंदिनी?”
राघव कुछ क्षण चुप रहा।
“सरकारी रिकॉर्ड में उसका स्टेटस आज भी लिखा है—‘लापता‘।“
“तो फिर…”
आदित्य ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।
“अगर वह लापता थी… तो उसकी तस्वीर उस वीरान मकान में कैसे पहुँची?”
राघव ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
“यही सवाल मैंने भी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पूछा था।”
“उन्होंने क्या कहा?”
“उन्होंने मुझे चेतावनी दी…”
“किस बात की?”
राघव की आवाज़ धीमी हो गई।
“उन्होंने कहा—अगर ज़िंदगी चैन से जीनी है… तो इस फ़ाइल को फिर कभी मत छूना।”
आदित्य ने कुर्सी से उठते हुए कहा—
“मैं यह मामला छोड़ने वाला नहीं हूँ।”
राघव भी खड़ा हो गया।
“तुम समझ क्यों नहीं रहे?”
“क्यों?”
“क्योंकि अब यह केवल तुम्हारी पत्नी का मामला नहीं रहा।”
“तो किसका है?”
राघव ने उत्तर देने के बजाय अपनी मेज़ की दराज़ खोली।
उसने भीतर से एक पुरानी डायरी निकाली।
उसके पन्ने पीले पड़ चुके थे।
“यह डायरी मुझे दो साल पहले रिकॉर्ड रूम में मिली थी।”
“किसकी है?”
“उस इंस्पेक्टर की…”
“कौन?”
“…जो नंदिनी के मामले की पहली जाँच कर रहा था।”
आदित्य की धड़कन तेज़ हो गई।
“उसमें क्या लिखा है?”
राघव ने डायरी खोली।
कुछ पन्ने फटे हुए थे।
कुछ पर स्याही फैल चुकी थी।
लेकिन आख़िरी पढ़े जा सकने वाले पन्ने पर केवल एक वाक्य लिखा था—
“अगर मेरे साथ कुछ हो जाए… तो समझ लेना कि नंदिनी ज़िंदा है…”
आदित्य के हाथ से डायरी लगभग छूट गई।
“क्या…?”
राघव ने सिर हिलाया।
“उस इंस्पेक्टर की अगले ही दिन सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी।”
“दुर्घटना?”
“सरकारी रिकॉर्ड में तो यही लिखा है।”
“और तुम्हें क्या लगता है?”
राघव की आँखें कठोर हो गईं।
“मुझे लगता है…”
“…वह दुर्घटना नहीं थी।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
आदित्य पहली बार समझने लगा था कि यह मामला किसी एक परिवार तक सीमित नहीं है।
किसी ने…
बहुत वर्षों से…
बहुत सावधानी से…
सच्चाई को दफ़न कर रखा था।
उसी समय राघव का इंटरकॉम बज उठा।
“सर…”
बाहर से कॉन्स्टेबल की आवाज़ आई।
“आपसे मिलने कोई आए हैं।”
“कौन?”
“उन्होंने नाम नहीं बताया।”
राघव ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“उन्हें बैठाइए।”
लेकिन अगले ही पल कॉन्स्टेबल की घबराई हुई आवाज़ आई—
“सर… वो… वो चले गए।”
“क्या?”
“उन्होंने बस यह लिफ़ाफ़ा दिया है।”
कुछ क्षण बाद कॉन्स्टेबल अंदर आया।
उसने मेज़ पर एक भूरा लिफ़ाफ़ा रखा।
उस पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—
“जाँच बंद कर दो… नहीं तो अगली तस्वीर तुम्हारे परिवार की होगी।”
कमरे का वातावरण अचानक भारी हो गया।
राघव ने तुरंत लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर केवल एक फोटो थी।
फोटो देखकर दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया।
वह तस्वीर…
आज सुबह की थी।
उसमें परी अपने स्कूल के बाहर खड़ी मुस्करा रही थी।
लेकिन तस्वीर दूर से टेलीफ़ोटो लेंस से खींची गई थी।
स्पष्ट था—
कोई कई दिनों से परी पर नज़र रख रहा था।
आदित्य की मुट्ठियाँ भींच गईं।
“अब यह लोग मेरी बेटी तक पहुँच गए…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
राघव ने गंभीर स्वर में कहा—
“आज से परी एक पल के लिए भी अकेली नहीं रहेगी।”
“लेकिन ये लोग हैं कौन?”
राघव कुछ बोलने ही वाला था कि उसके मोबाइल पर एक संदेश आया।
उसने स्क्रीन देखी…
और उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
आदित्य ने पूछा—
“क्या हुआ?”
राघव ने बिना कुछ कहे मोबाइल उसकी ओर बढ़ा दिया।
संदेश केवल एक पंक्ति का था—
“तुमने चेतावनी नहीं मानी, राघव। अब बारी तुम्हारी है।”
उसके नीचे एक वीडियो क्लिप थी।
राघव ने काँपते हाथों से वीडियो चलाया।
स्क्रीन पर रात का दृश्य दिखाई दिया।
एक कार…
तेज़ रफ़्तार…
और फिर—
धड़ाम!
कार एक ट्रक से टकरा गई।
वीडियो यहीं समाप्त हो गया।
आदित्य ने हैरानी से पूछा—
“यह क्या है?”
राघव ने भारी आवाज़ में उत्तर दिया—
“यह वही दुर्घटना है…”
“…जिसमें नंदिनी वाले केस के इंस्पेक्टर की मौत हुई थी।”
आदित्य ने फिर वीडियो देखा।
इस बार उसकी नज़र सड़क किनारे खड़ी एक काली एसयूवी पर गई।
दुर्घटना से ठीक पहले…
वह कार धीरे-धीरे पीछे हटती दिखाई दी।
मानो…
कोई पूरी घटना रिकॉर्ड कर रहा हो।
यह दुर्घटना नहीं थी।
यह योजनाबद्ध हत्या थी।
और जिसने यह वीडियो आज भेजा था…
वह यह बताना चाहता था कि—वह बीस साल पहले भी मौजूद था… और आज भी सब पर नज़र रखे हुए है।
(क्रमश:)
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