“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…अतीत का कैदी
जलती हुई कार की लपटें रात के अँधेरे को चीर रही थीं।
चारों ओर अफरा-तफरी मच गई थी।
पड़ोसी घरों से बाहर निकल आए थे। कोई दमकल को फोन कर रहा था, कोई पुलिस को। कुछ लोग बाल्टियों में पानी भर-भरकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन विस्फोट इतना भीषण था कि कार कुछ ही मिनटों में लोहे के कंकाल में बदल गई।
आदित्य सड़क पर खड़ा उस आग को देख रहा था।
उसके कानों में अब भी धमाके की गूँज थी।
लेकिन उससे भी ज़्यादा भयावह था वह दृश्य…
जब काली एसयूवी में बैठा अज्ञात व्यक्ति जाते-जाते उसकी ओर देखकर मुस्कराया था।
वह मुस्कान किसी जीत का ऐलान थी।
मानो वह कह रहा हो—
“अभी तो खेल शुरू हुआ है।”
पीछे से परी रोते हुए दौड़ी और आदित्य से लिपट गई।
“पापा… क्या कोई हमें मार देगा?”
आदित्य ने तुरंत उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
“नहीं बेटा…”
उसने खुद को मज़बूत दिखाने की कोशिश की।
“जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।”
लेकिन यह कहते समय पहली बार उसे अपनी ही आवाज़ पर भरोसा नहीं था।
क्योंकि वह जान चुका था—
दुश्मन केवल ताकतवर नहीं था…
वह हर कदम उनसे कई चाल आगे चल रहा था।
कुछ ही देर में पुलिस घटनास्थल पर पहुँच गई।
इंस्पेक्टर राजेश चौहान ने कार के मलबे का निरीक्षण किया।
“यह सामान्य आग नहीं है।”
उन्होंने फॉरेंसिक टीम की ओर देखते हुए कहा।
विशेषज्ञों ने कार के नीचे से धातु के कुछ छोटे-छोटे टुकड़े बरामद किए।
डॉ. मीरा सक्सेना ने उन्हें ध्यान से देखा।
“इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस…”
उन्होंने गंभीर स्वर में कहा।
“किसी ने कार के इंजन के नीचे रिमोट-ऑपरेटेड विस्फोटक लगाया था।”
राजेश ने आदित्य की ओर देखा।
“मिस्टर वर्मा…”
“जी?”
“यह हमला आपको डराने के लिए नहीं था।”
“तो?”
“अगर आप पाँच मिनट पहले घर पहुँच गए होते…”
उन्होंने अधूरी बात छोड़ दी।
आदित्य समझ गया।
यह विस्फोट उसके लिए था।
रात लगभग बारह बजे।
पुलिस ने पूरे घर की सुरक्षा बढ़ा दी थी।
दो सशस्त्र जवान बाहर तैनात थे।
लेकिन घर के भीतर का माहौल पहले से अधिक डरावना था।
परी डर के कारण बार-बार नींद से जाग जाती।
हर छोटी-सी आवाज़ पर चौंक जाती।
अनामिका उसके सिर पर हाथ फेरती रही।
लेकिन उसकी अपनी आँखों में भी नींद नहीं थी।
उसी रात…
करीब डेढ़ बजे।
घर की घंटी बजी।
ट्रिन… ट्रिन…
सब चौंक उठे।
इतनी रात को कौन हो सकता था?
बाहर पुलिस वाले मौजूद थे।
फिर भी घंटी दोबारा बजी।
आदित्य धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुँचा।
दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ़ एक पुराना लकड़ी का बक्सा रखा था।
उसके ऊपर एक छोटा-सा कागज़ चिपका था—
“यह उसके अतीत का आख़िरी सबूत है।”
आदित्य ने सावधानी से बक्सा उठाया।
पुलिस ने पहले उसकी जाँच की।
कोई विस्फोटक नहीं मिला।
तब जाकर उसे खोला गया।
अंदर…
पुराने पत्र…
कुछ तस्वीरें…
और एक ऑडियो कैसेट रखी थी।
साथ में एक छोटा-सा टेप रिकॉर्डर भी।
विनोद…
जो अब तक पूरे मामले को चुपचाप देख रहा था…
पहली बार आगे बढ़ा।
हाँ…
यही वही साधारण व्यक्ति था जो अदालत में दर्शक बनकर बैठा था।
पिछले कुछ दिनों से वह बिना किसी औपचारिक परिचय के राजेश के साथ इस मामले पर नज़र रख रहा था।
उसने रिकॉर्डर उठाया।
“सुनते हैं…”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कैसेट चलने लगी।
पहले कुछ सेकंड केवल खरखराहट सुनाई दी।
फिर…
एक पुरुष की काँपती हुई आवाज़ गूँजी।
“अगर यह रिकॉर्डिंग किसी के हाथ लगी है… तो समझिए मैं शायद अब ज़िंदा नहीं हूँ…”
अनामिका अचानक काँप उठी।
“यह…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“…यह पापा की आवाज़ है।”
कमरे में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए।
रिकॉर्डिंग आगे बढ़ी—
“मेरा नाम प्रोफेसर शैलेन्द्र मिश्रा है। मेरी बेटी नंदिनी को किसी ने अगवा नहीं किया था…”
सभी की साँसें थम गईं।
“…उसे हमने अपनी मर्ज़ी से दुनिया की नज़रों से छिपाया था।”
आदित्य ने अनामिका की ओर देखा।
उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
रिकॉर्डिंग जारी थी—
“क्योंकि जिसने हमारे परिवार को निशाना बनाया था… वह केवल नंदिनी को नहीं चाहता था…”
कुछ सेकंड तक आवाज़ टूटती रही।
फिर एक वाक्य साफ़ सुनाई दिया—
“…उसे ‘प्रोजेक्ट समय‘ की फ़ाइल चाहिए थी…”
रिकॉर्डिंग अचानक बंद हो गई।
कैसेट वहीं समाप्त हो गई थी।
कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, मानो किसी ने सबकी साँसें रोक दी हों।
सबसे पहले इंस्पेक्टर राजेश बोले—
“प्रोजेक्ट… समय?”
विनोद की आँखों में पहली बार गहरी चमक उभरी।
वह बहुत देर तक कुछ सोचता रहा।
फिर धीरे से बोला—
“तो… बात यहाँ तक पहुँच चुकी है।”
राजेश ने हैरानी से पूछा—
“आप इस नाम को जानते हैं?”
विनोद ने सीधा उत्तर नहीं दिया।
वह खिड़की के पास जाकर बाहर देखने लगा।
कुछ क्षण बाद बोला—
“बीस साल पहले देश के कुछ चुनिंदा वैज्ञानिक एक अत्यंत गोपनीय परियोजना पर काम कर रहे थे।”
“कौन-सी परियोजना?”
“उसका कोड नेम था…”
वह रुका।
“…प्रोजेक्ट समय।“
आदित्य ने तुरंत पूछा—
“वह परियोजना थी क्या?”
विनोद ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“अगर मेरी आशंका सही है…”
“…तो तुम्हारी पत्नी का अतीत केवल एक गुमशुदा लड़की की कहानी नहीं है।”
“फिर?”
विनोद ने धीरे-धीरे सबकी ओर देखा।
“वह ऐसे रहस्य की गवाह है…”
“…जिसके लिए लोग बीस साल बाद भी हत्या करने को तैयार हैं।”
इतने में अचानक पूरे घर की बिजली चली गई।
चारों ओर घना अँधेरा छा गया।
बाहर तैनात पुलिसकर्मियों की आवाज़ सुनाई दी—
“कौन है वहाँ?”
फिर…
धाँय…!
एक गोली चली।
उसके तुरंत बाद दूसरी।
धाँय…!
परी चीख उठी।
अनामिका ने उसे अपनी बाँहों में छिपा लिया।
विनोद ने जेब से पिस्तौल निकाली।
उसकी आवाज़ अब बिल्कुल बदल चुकी थी—
शांत…
कठोर…
और आदेशात्मक।
“सब लोग नीचे झुक जाओ!”
उसी क्षण बैठक की खिड़की का शीशा टूट गया।
एक छोटी-सी धातु की वस्तु कमरे के बीचों-बीच आकर गिरी।
वह धीरे-धीरे घूम रही थी…
और उसमें से लाल रंग की एक बत्ती टिमटिमा रही थी।
विनोद की आँखें फैल गईं।
वह पूरी ताकत से चिल्लाया—“सब लोग ज़मीन पर लेट जाओ… यह ग्रेनेड है!”
(क्रमश:)
No Comment! Be the first one.