“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
मोहब्बत और महत्वाकांक्षा
दूसरे ही दिन बशीर खान उसी अनाथालय में मौजूद था जहाँ का एड्रेस लैला ने दिया था। वहीं से पता लगा कि लैला भी अनाथ थी और उसी अनाथालय में पली-बढ़ी है, और वह अपने अच्छे व्यवहार, अपनी सादगी और ख़ूबसूरती के लिए जानी जाती थी।
उस मीटिंग के बाद तो उनकी दोस्ती के नए आयाम स्थापित होने लगे। पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। इसी प्रकार बहुतों को दिख रहा था कि उन दोनों का रिश्ता कहाँ जाकर रुकेगा।
बशीर ने लैला को अपनाने का फैसला कर लिया था और जब उसने अपनी दोनों बहनों को बताया तो एक अरसे के बाद वो दोनों बहुत ख़ुश हुईं और फ़ौरन शादी की तारीख तय करने को बोलीं।
ख़ुद बशीर भी जल्द से जल्द लैला को अपने घर में लाना चाहता था लेकिन उन्हीं दिनों मंत्री पद का चुनाव सिर पर था और उसे करोड़ों रुपए की ज़रूरत थी।
पैसों के इंतज़ाम में वो बेहद मशरूफ़ हो गया था। हर रोज़ किसी न किसी मंत्री या उद्योगपति के साथ उसकी मीटिंग चल रही होती थी। साथ-साथ शादी की तैयारियां भी पूरे ज़ोर-ओ-शोर से चल रही थीं।
दोनों बहनों के घर आ जाने से घर में रौनकें उतर आई थीं। हर तरफ़ खुशियों की चहकार थी, हर किसी के चेहरे खिले पड़े थे।
शादी की सारी रस्में बशीर के घर पर ही हो रही थीं। हल्दी, मेंहदी और अब निकाह का फंक्शन भी उसके घर पर ही अरेंज किया गया था। घर को फूलों और लाइटों से दुल्हन की तरह सजा दिया गया था। पूरा घर जगमगा उठा था।
ऐसा लग रहा था जैसे सारे जहान की चाँदनियां बशीर के आँगन में उतर आई हों। और उस पर सोने पर सुहागा दुल्हन का हुस्न गज़ब ढा रहा था।
लैला सज-संवरकर दुल्हन बनी क़यामत लग रही थी। बशीर भी कुछ कम नहीं लग रहा था, व्हाइट शेरवानी में वो बिल्कुल कोई शहज़ादा लग रहा था।
उसकी बहनें उन दोनों की नज़रें उतारे जा रही थीं क्योंकि वहाँ आए हर किसी की नज़रें उनके ऊपर ही उठ रही थीं और सभी उन दोनों की जोड़ी को सराह रहे थे।
निकाह की टाइमिंग दोपहर तीन बजे की थी, फिर खाना और उसके बाद रूख़सती होनी थी। वैसे तो दो-ढाई बजे तक सारे मेहमान आ गए थे। लेकिन एक मंत्री महोदय पौने तीन बजे तक भी नहीं पहुँचे थे।
बशीर उनके बिना निकाह कैसे कर सकता था जबकि सबसे स्पेशल गेस्ट वही थे। उनकी मदद से ही बशीर को टिकट मिल पाया था और उसे पूरा यक़ीन था कि वह चुनाव जीता भी देंगे, और बशीर के मंत्री बनने का सपना पूरा हो जाएगा।
बशीर बार-बार अपनी घड़ी देख रहा था तभी मंत्री जी की गाड़ियां आनी शुरू हुईं।
फिर मंत्री जी के आते ही निकाह की रस्म अदा की गई।
और तब पहली बार बशीर ने मंत्री जी से लैला को मिलवाया।
मंत्री जी बुत बने लैला को देखते रह गए…
(क्रमश:)