“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
शोहरत के पीछे भागता आदमी
मगर अब जो बशीर खान सबके सामने था वो अपने ज़मीर को गहरी नींद सुला चुका था। और जिसका ज़मीर ही सो चुका हो तो उसके दिल में ना तो हमदर्दी का वास हो सकता है ना ही मोहब्बत का।
अब तो जमीला और सकीना भी बहुत कम ही मिलने आती थीं और बशीर के पास भी अब समय नहीं होता था तो उसको ख़ास कोई फ़र्क भी नहीं पड़ता था। वो अभी जीत के नशे में था और अंधाधुंध भाग रहा था शोहरत के पीछे…
एम.एल.ए. की कुर्सी हासिल करने के बाद उसको मंत्री मंडल में शामिल होना था। अब उसने मंत्री बनने के लिए भाग-दौड़ शुरू कर दी थी।
लैला से उसकी मुलाक़ात भी उन्हीं दिनों हुई थी। लैला किसी अनाथालय की ओर से फंड के लिए आई थी। लैला जब बशीर के ऑफिस पहुँची तो बशीर ने मिलने से मना कर दिया क्योंकि वो फाइलों में काफी उलझा हुआ था।
रात को दस बजे जब वो घर पहुँचा तो नौकर ने बताया—
“सर, आपकी कोई रिश्तेदार आईं हैं आपसे मिलने।”
बशीर ने सोचा कि जमीला या सकीना आईं होंगी। बहनों का सोचकर एक अरसे के बाद उसकी पुरानी मुस्कान उसके होंठों पर खेल गई।
“जमीला आई है या सकीना!”
“नहीं, दोनों बाजी में से कोई नहीं आईं हैं। यह कोई और मैडम हैं। मैं नहीं जानता इनको।”
“अच्छा!”
बशीर हैरान होता हुआ ड्रॉइंग रूम में पहुँचा तो देखा कि एक लड़की सोफे के एक कोने पर बैठी थी। बशीर को अंदर दाख़िल होते देखकर वो लड़की खड़ी हो गई और सलाम किया। बशीर सलाम का जवाब देता हुआ दूसरे सोफे पर बैठ गया और उस लड़की को देखकर याद करने की कोशिश करने लगा कि इससे कब और कहाँ मिला था जो ये मुझको अपना रिश्तेदार बता रही थी।
लेकिन पता नहीं क्यों वो अनजान भी नहीं लग रही थी। बशीर को चुप देखकर वो लड़की बोलने के लिए शब्द तलाशने लगी।
“आई एम सॉरी सर, मैंने बहुत मजबूर होकर झूठ बोला आपसे मिलने के लिए।”
“ऐसी क्या मजबूरी थी, पूछ सकता हूँ?”
बशीर ने भंवे चढ़ाकर पूछा तो उसके ऐसे रिएक्शन पर वो लड़की अपने दोनों हाथों को मलते हुए ख़ुद को जवाब देने के लिए तैयार करने लगी थी।
“वो.. क्या है न सर, मैं एक अनाथालय से आई हूँ। मैं पहले भी आपके ऑफिस आई थी लेकिन आपसे मुलाक़ात ना हो सकी। मैं जिस अनाथालय से आई हूँ वहाँ की हालत बहुत ख़राब हो रही है। अगर आप फंड अप्रूव कर दें तो बच्चों की बड़ी हेल्प हो जाएगी।”
“ओके, आपका काम हो जाएगा। आपका शुभनाम मिस…?”
“जी, मेरा नाम लैला है।”
“ओके लैला जी, आप बिल्कुल चिंता मत करिए, समझिए काम हो गया।”
फिर लैला तो उठकर चली गई मगर उसका नाम बशीर के कानों में गूंजता रहा…
“लैला…”
(क्रमश:)
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