“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
लैला की ख़ामोशी
पहले तो लैला को कुछ समझ में ही नहीं आया कि बशीर क्या कह रहे हैं। जब समझ में आया तो उस पल उसको शिद्दत से एहसास हुआ कि सच में अनाथों का कोई भी नहीं होता, वो पति भी नहीं… जो उम्र भर साथ निभाने का वादा करता है।
वो भी उसे बेकार सामान ही समझता है, जिसको जब ज़रूरत हुई तब काम ले लिया।
उस लम्हे लैला को बशीर से नहीं, ज़िंदगी से नफ़रत सी हो रही थी।
उसको इस तरह ख़ामोश देखकर बशीर ने उसका हाथ थाम लिया—
“लैला मेरी जान, कुछ बोलो तो.. इस तरह ख़ामोश ना रहो। अगर तुमने इनकार कर दिया तो वो मेरा टिकट कैंसल कर देंगे, और फिर कभी कोई चुनाव नहीं लड़ने देंगे। मेरा बरसों का सपना टूट जाएगा। देखो, सिर्फ़ एक रात की बात है, सुबह मैं तुम्हें लेने आ जाऊंगा!”
लैला फिर भी बिल्कुल ख़ामोश बस बशीर को देखती रही। बशीर ने फिर कहा—
“लैला! तुम सुन रही हो? मंत्री जी की गाड़ी आ गई है तुम्हें लेने!”
“हाँ, मैं सुन रही हूँ। आप फ़िक्र मत करिए, आपका सपना ज़रूर साकार होगा।”
लैला ने उसके गालों को छुआ और उठकर गेट की तरफ़ बढ़ गई…
वो दूर से दूर होती जा रही थी और बशीर को लगने लगा कि उसके जिस्म-ओ-रूह का एक अहम हिस्सा उससे हमेशा के लिए अलग हो गया है। वो ख़ुद को अधूरा महसूस करने लगा था।
रात के दस बज रहे थे और पूरा घर खाली हो गया था। नौकरों के अलावा सभी चले गए थे। बशीर उठकर अपने कमरे में आया तो फूलों से महकती सेज उसका मज़ाक उड़ाने लगी।
वो घबराकर टेरिस पर आकर सिगरेट पीने लगा। फिर रात भर वो वहीं बैठा सिगरेट पर सिगरेट फूंकता रहा।
न जाने रात के किस पहर उसकी आँख लग गई वहीं बैठे-बैठे।

सूरज की पहली किरण जैसे ही उसके चेहरे पर पड़ी वो हड़बड़ा कर उठ गया और जल्दी-जल्दी कपड़े बदलकर लैला को लेने निकल गया।
मगर वहाँ जाकर पता चला कि लैला तो सुबह पाँच बजे ही वहाँ से चली गई है और उसने उनकी गाड़ी से भी जाने से इनकार कर दिया था।
लैला को मंत्री के घर से निकले दो घंटे से ऊपर हो गया था लेकिन वो अब तक घर नहीं पहुँची थी।
बशीर ने सारा शहर छान मारा लेकिन वो कहीं नहीं मिली।
शाम को जब थककर वो बैठा तो पुलिस उसकी लाश लिए उसके घर आ गई, जो दरिया किनारे पाई गई थी।
बशीर के ऊपर तो पहाड़ गिर पड़ा था।
उसने तो ऐसा कभी सोचा भी नहीं था कि लैला ऐसे उसे छोड़कर जा सकती है!
लेकिन लैला मरकर भी उसके लिए कामयाबी की खिड़कियां खोल गई थी।
लैला की मौत के बाद बशीर की ज़िंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जहाँ उसकी निजी त्रासदी और राजनीतिक सफलता एक-दूसरे में उलझ गईं।
(क्रमश:)