जब मजबूरी ने बदली मंज़िल — एक लड़की की करुण पुकार से शुरू हुई नई क्रांति
आश हम्द, पटना
सारांश:
“मज़बूरी” कहानी है शिवानी की — एक आत्मनिर्भर, विद्रोही युवती की, जो अपने परिवार की दिखावेभरी सोच से तंग आ चुकी है। लेकिन किस्मत उसे एक ऐसी लड़की से मिलवाती है, जिसकी मदद करते हुए वह खुद एक नई दिशा पाती है। यह कहानी दिखाती है कि इंसान जब किसी और की मजबूरी को अपना मक़सद बना ले, तो ज़िंदगी सच में अर्थपूर्ण बन जाती है।आइए, अब विस्तार से पढ़ें इस प्रेरक और अनूठी कहानी के आखिरी चैप्टर को—
“ द.. दी…दीदी… दीदी मेरी मदद करो…! दीदी मुझे बचा लो ! वो लोग मुझे मार डालेंगे… प्लीज दीदी मुझे बचा लो……!”
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मैंने जल्दी से उसे गाड़ी के अंदर लिया और गाड़ी आगे बढ़ा दी। अचानक आए सिचुएशन से मैं बेहद घबरा गई थी, लेकिन फिर मैंने ख़ुद को शांत किया और सीधी रेस्टोरेंट पहुँच गई जहाँ मेरा इंतज़ार करके आकाश अब वहाँ से निकलने वाला था। जब मैं वहाँ पहुँची –
“ तुम अब आ रही हो ? मैं तो अब जाने वाला था। मुझे लगा तुम नहीं आओगी ।”
“ ऐसा नहीं है, मैं फंस गई थी कहीं ।”
मैंने एक चेयर पर उस लड़की को बिठाते हुए कहा।
“ यह लड़की कौन है ?”
“ बताती हूँ, बैठो तो सही ।”
बैठने के बाद हम उस लड़की को देखने लगे। वह सोलह सत्रह साल की सुंदर सी बच्ची थी। वो डरी-सहमी इधर-उधर देख रही थी।
“ सुनो, तुम्हारा नाम क्या है बेटा ?”
“ म..म्म..मी.. मीणा !”
“ अच्छा, तो तुम किससे भाग रही थी बेटा ? पूरी बात बताओ मुझे ?”
हमारे पूछने पर मीणा बताने लगी।
“ दीदी, हम तीन बहनें और दो भाई हैं। माँ-बाप मज़दूरी करते हैं। मैं और मेरी दीदी एक फैक्ट्री में काम करते थे, वहीं के एक मैनेजर ने एक दिन धोखे से मुझे दूसरी जगह भेज दिया यह कहकर कि अब तुम्हें वहाँ काम करना है। मैं जब वहाँ गई तो उन लोगों ने मुझे क़ैद कर लिया। वहाँ और भी बहुत सी लड़कियां क़ैद थीं, हम सबको वो लोग विदेश में भेज रहे थे। मैं बहुत मुश्किल से वहाँ से भाग पाई हूँ। अब वह लोग मुझे हर जगह ढूँढ रहे हैं।
आकाश और मैंने मिलकर इस मसले को हल करने का फ़ैसला किया। फिर पुलिस और मीणा की मदद से हम और बीस लड़कियों को उन दरिंदों से बचाने में कामयाब हो गए।
“ शिवानी, अब आगे का क्या करना है ? इन बच्चियों को उनके घर भेजना है या….?”
“ यह तो इनसे ही पूछना पड़ेगा, यह क्या चाहती हैं। बताओ बच्चों तुम अपने घर जाना चाहती हो ?”
मैंने उन लड़कियों का डर दूर करने की गर्ज से हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछा।
“ नहीं.. नहीं..दीदी हमें घर मत भेजो, हमें फिर काम के लिए निकाला जाएगा और फिर वही होगा… नहीं दीदी.. हमें किसी अनाथालय भेज दो ।”
मीणा ने हाथ जोड़कर विनती की और बाकी सबने भी सहमति जताई। आकाश और मैंने एक दूसरे की तरफ़ देखा।
“ क्या करना है आकाश ? क्या करना चाहिए हमें ?”
“ सुनो मेरी बात, अभी इन सबको मेरे रेस्ट हाउस पर लेकर चलते हैं, फिर सोचते हैं क्या करना है ।”
“ हाँ, यह ठीक है ।”
फिर मैंने और आकाश से मिलकर एक ऐसी संस्था बनाई जिसका सोशल मीडिया से कोई वास्ता नहीं था। ऐसा करने के पीछे हमारी नेक नियती रही कि अगर हम कोई नेकी करते हैं तो ऐसे करना चाहिए कि दूसरे हाथ को भी पता न चले। अभी दौर ये है कि कुत्ते को खाना खिलाते हुए भी पिक्चर अपलोड करते हैं। बाकी हमें जहाँ भी इस तरह की पीड़ित लड़की या महिला मिलती हम उनकी हर तरह से मदद करते हैं।
कुछ ही सालों में यहाँ बहुत सी लड़कियां और आ गईं जो या तो घर से ठुकराई गई थी, या मीणा जैसे मामले का शिकार हुई थीं। इस संस्था की विशेषता यह थी कि यह किसी सरकारी फंड या उद्योगपतियों द्वारा दिए गए डोनेशन से नहीं चलती थी, बल्कि यह उन लड़कियों के हुनर के बल पर चलती है। बड़ी-बड़ी कंपनियों से हम कपड़े सिलने, कढ़ाई-बुनाई और तरह-तरह के काम के आर्डर लाते हैं और लड़कियों द्वारा काम पूरा होने पर डिलीवरी कर देते। इस तरह उन लड़कियों का भविष्य उज्जवल बनाने की पूरी कोशिश की हमने और हम कामयाब भी रहे…
मेरी और आकाश की शादी हो गई। अब मुझे लगता है कि मेरी माँ ने सही फ़ैसला लिया था मेरे लिए। आकाश के साथ मुझे इस ज़िंदगी को सार्थक बनाने का मक़सद भी मिल गया था….
(काल्पनिक रचना)
2 Comments
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Badhiya Kahaani.
A beautiful story .