जहां कल्पनाओं की लहरें मिलती हैं बदरा की बूँदों से — दिल और ज़िंदगी दोनों भीग उठते हैं।
आश हम्द, पटना
सारांश:
आश हम्द की कविताएं “कल्पनाओं के सागर में” और “बदरा आई” मनुष्य की भावनाओं और प्रकृति की सुंदरता को एक साथ पिरोती हैं। पहली कविता कल्पना, ख़्वाब और उम्मीद की दुनिया में आत्म-प्रेरणा जगाती है, जबकि दूसरी कविता बरसात के आगमन की रूमानी अनुभूति कराती है। पाठक को जीवन के सूखेपन में नमी और दिल में ताज़गी का एहसास देने वाली इन कविताओं को अब पढ़ें विस्तार से—
कल्पनाओं के सागर में
अपनी कल्पनाओं के सागर को बहने दीजिए,
उठती-गिरती लहरों को ज़रा मचलने दीजिए ।
कांटों से आरास्ता है सारी ज़मीन हक़ीक़त की,
ख़्वाबों ख़्यालों में ही दिन-रात को ढलने दीजिए।
कल्पनाओं के जहां में……
मोहब्बतें की पनाह में…..
गुमशुदा सी है यह ज़िंदगी….
सब कुछ पा लेने की चाह में…..
धड़कनों की सदा को ख़ुद को सुनने दीजिए,
कल्पनाओं के सागर को यूं ही बहने दीजिए।
कोई राह समझ ना आए तो क्या !
मंज़िल दूर-दूर नज़र आए तो क्या !
ना थकना है ना ही रुकना है हमें,
फिर कोई भी मुश्किल आए तो क्या !
हक़ीक़त को छुपा ही अभी रहने दीजिए।
कल्पनाओं के सागर को ही बहने दीजिए।
हज़ारों बंदिशें हैं हक़ीक़त के इस जहां में,
दो घड़ी और दयार-ए-ख़्याल में ठहरने दीजिए।
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बदरा
छाया है बड़े दिनों के बाद यह बदरा,
आया है लगाके जैसे आँखों में कजरा।
सूखी ज़मीन पे छा गई है हरियाली,
ख़ुशी से झूम रही हैं सरसब्ज़ डाली डाली।
चिड़ियों की चहचहाहट से गूंजा आसमां,
हर दिल के आज पूरे हो रहे हैं अरमां।
बारिश की बूँदें धरा को यूं भिगो रही हैं,
सहरा को जैसे सैराब वह कर रही हैं।
पेड़ों की डालियाँ बन गईं हैं जैसे झूले,
हर शाख पर पंछियों का झुंड हैं झूमे।
मन मस्त मलंग बना उड़ा जा रहा है,
झमझम बरसती बूँदों को ख़ुद में समा रहा है।
बरसों बाद आज खुलकर बरसा है बदरा,
सराबोर हुआ तन, धुल गया आसमां का कजरा।
One Comment
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Bahut accha hai dhanyawad iske liye.