ज़िंदगी के सफ़र में, जहाँ फ़र्ज़ निभाने की दौड़ है — वहीं कहीं ‘मैं’ भी सांस लेने की दिली ख्वाहिश है।
आश हम्द, पटना
सारांश:
इन रचनाओं में रचनाकार ने इंसान के भीतर की उस आवाज़ को शब्द दिए हैं जो अक्सर रिश्तों, ज़िम्मेदारियों और समाज की अपेक्षाओं में दब जाती है।‘मेरा फ़र्ज़’ में आत्मत्याग और अधूरेपन की पीड़ा है, जबकि ‘क्या पाया हूँ मैं’ में ज़िंदगी की उलझनों के बीच आत्मखोज की गूंज सुनाई देती है। दोनों रचनाएँ मिलकर एक ऐसा आईना बनाती हैं जिसमें हर संवेदनशील दिल अपनी ही परछाई देख सकता है। आइए, इन दिलचस्प और प्रेरक रचनाओं का आनंद लें, विस्तार
से—
मेरा फ़र्ज़
चलो! जो, जैसे, भी हुआ, वह अच्छा हुआ।
जिन जिन रिश्तों का था जो फ़र्ज़ पूरा हुआ।
करके पूरे सारे फरायिज़ जब हुए फारिग,
ख़ुद पर जो मेरा फ़र्ज़ था, वह अधूरा हुआ।
कई सारे ज़ख़्म सिल गए वक़्त के ताज़िए में,
कुछ दर्द ऐसा था जो ख़ामोशी में हल्का हुआ।
चलते चलते बहुत दूर हम निकल आए जब,
तब जाना कि…क्या-क्या पीछे है, छूटा हुआ।
अपनों के चेहरों पर मुस्कान ही रखी हमने,
पर आईना कहता है, हर चेहरा अधूरा हुआ।
हर दिल की हिफाज़त की होंठों को सिलके,
बाहर सब ठीक है, अन्दर था कुछ टूटा हुआ।
सोचते हैं थोड़ी सी मोहलत ख़ुद को भी दे दूं,
कि सबसे मिलते-मिलते “मैं” तो पोशीदा हुआ।
****************
क्या पाया हूँ मैं
क्या खोया और क्या पाया हूँ मैं।
चंद लफ़्ज़ों के मोती संग लाया हूँ मैं।
आँखें खुलते ही मुफलिसी से नाता जुड़ा।
ममता का आँचल भी चंद घड़ियों में छूटा।
रहा सहारे ढूँढता मैं गैरों में उम्र भर,
साथ अपनों का भी कहाँ पाया हूँ मैं।
चखा हूँ स्वाद सूखी रोटी का भी मैं
तो आसाइशों से भी आशना हुआ हूँ मैं
गर गुज़ारे हैं लम्हें मजदूरों के संग
तो अफसरानों के साथ भी बैठा हूँ मैं
लहू से सींच जिन पौधों को था शजर बनाया,
हौसलों की बूंदें बरसा उनको खिलाया हूँ मैं।
जब आज ज़िंदगी की धूप मुझे जलाने लगी….
उन्हीं दरख़्तों में अब ख़ुद को छुपाया हूँ मैं।
कमरे की तन्हाइयां मुझे अक्सर डराती हैं।
खिड़कीयां दरवाज़े उदास सी नज़र आती हैं।
सफ़र के साथी ने भी जब साथ न मेरा निभाया,
तो अपनी चाहतों को ख़ुद पर ही बरसाया हूँ मैं।
जहाँ से चला था, वहीं फिर से पहुँच गया हूँ मैं,
तन्हा ही आया था जहां में, तन्हा ही रह गया हूँ मैं।
****************
आश हम्द : एक परिचय
पटना, बिहार की निवासी आश हम्द जी आज हिंदी साहित्य की उन दमदार लेखिकाओं में गिनी जाती हैं, जिन्होंने अपने लेखन से न केवल पाठकों का मन जीता है, बल्कि साहित्यिक जगत में भी एक विशिष्ट स्थान बना लिया है।
उनकी कविताओं में संवेदना की गहराई, अनुभवों की प्रामाणिकता और भाषा की सरलता पाठकों को सीधे दिल से जोड़ देती है। उनके अब तक के दो काव्य संग्रह — “दास्तान-ए-जिंदगी” और “उनकी नाज़ुक यादें” — सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर खूब सराहे गए हैं। इन रचनाओं में जीवन के विविध रंग, प्रेम, पीड़ा, संघर्ष और स्मृतियों की महक बेहद प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुई है।
आश जी की लेखनी में नारी-संवेदना का स्वर भी विशेष रूप से झलकता है, जो उनके लेखन को एक विशेष पहचान देता है। यही नहीं, वे अनेक साझा संकलनों और प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में भी नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं, जो उनके साहित्यिक सक्रियता और गुणवत्ता को दर्शाता है।
अब पाठकों को उनके आगामी कहानी संग्रह “कहानी अधूरी सी” का बेसब्री से इंतज़ार है, जो यकीनन उनके लेखकीय सफर का एक और सशक्त पड़ाव होगा।
आश ह्मद जी की रचनात्मक यात्रा हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाली है। वे आज की युवा पीढ़ी की उन लेखिकाओं में हैं, जो न केवल भावनाओं को खूबसूरती से शब्दों में ढालती हैं, बल्कि समाज को एक नया दृष्टिकोण भी देती हैं। उनके आने वाले सभी साहित्यिक प्रयासों के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।
One Comment
Comments are closed.
इनकी कविता पढ़कर अच्छा लगा।