.“समय का सम्मान, रिश्तों का सम्मान है!”
प्र्स्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
..वेटर ने पास आकर कहा, “मैम, खाना लगवा दें?”
दीप्ति ने धीमी आवाज में कहा, “नहीं, थोड़ा और रुकिए।”
उसे लगने लगा जैसे उसके अंदर कुछ टूट रहा है। आँखों के आगे धुंध-सा छा गया। वह कुर्सी पर झुक गई और बोली, “पानी दीजिए… मुझे थोड़ा पानी चाहिए।”
वह पानी पीकर गहरी सांस लेने लगी। लेकिन आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।
उसने खुद से कहा, “क्या मेरी इतनी भी औकात नहीं कि कोई वक्त पर आ जाए?”
थोड़ी देर बाद, चार बजकर पंद्रह मिनट पर पहली गाड़ी होटल के बाहर आकर रुकी। उसके ऑफिस के दो सहकर्मी अंदर आए।
“सो सॉरी दीप्ति! ट्रैफिक बहुत था,” उन्होंने हँसते हुए कहा।
दीप्ति ने हल्के से मुस्कुराया, “कोई बात नहीं, आइए।”
धीरे-धीरे और लोग आने लगे — कोई साढ़े चार बजे, कोई पाँच बजे। तब तक खाना ठंडा हो चुका था, केक सूख गया था और दीप्ति का जोश खो चुका था।
अब हॉल में लोग थे, हँसी-ठिठोली थी, पर दीप्ति की मुस्कान बनावटी थी।
उसकी एक सहेली उसके पास आई, “यार, तू इतनी टेंशन क्यों ले रही है? इंडिया में टाइम पे कौन आता है?”
दीप्ति ने शांत स्वर में कहा, “पर क्या आदतें इतनी पक्की हो गई हैं कि इंसान की भावनाएँ भी टाइमिंग के साथ एक्सपायर हो जाएँ?”
सहेली चुप हो गई। वह समझ गई थी कि दीप्ति सचमुच आहत है।
अब पाँच बज चुके थे। होटल स्टाफ याद दिलाने आया, “मैम, आपका टाइम छह बजे तक का है।”
दीप्ति ने सिर हिलाया। उसने चारों ओर देखा — सब लोग मोबाइल से फोटो ले रहे थे, वीडियो बना रहे थे। हर कोई मस्ती में था, लेकिन कोई नहीं समझ पा रहा था कि दीप्ति के भीतर कैसी बेचैनी है।
तभी उसका पुराना कॉलेज फ्रेंड अमन आगे आया। उसने माइक उठाया और कहा, “दोस्तों, हम सब दीप्ति से माफ़ी मांगना चाहते हैं। हमने इसे इंतज़ार कराया, जबकि इसे खुश करना चाहिए था। दीप्ति, तूने जो मेहनत की, वो हम सबके लिए बहुत मायने रखती है। अब से वादा करता हूँ, कभी इंडियन टाइमिंग नहीं अपनाऊँगा।”
हॉल में तालियाँ गूँज उठीं। दीप्ति के चेहरे पर हल्की मुस्कान लौटी।
उसने आँसू पोंछते हुए कहा, “मैं किसी से नाराज़ नहीं हूँ। बस इतना चाहती हूँ कि अगली बार जब कोई कहे ‘तीन बजे आना’, तो कोई तीन बजे पहुँचे भी।”
छह बजे पार्टी खत्म हो गई। होटल के बाहर शाम उतर आई थी। दीप्ति अकेली खड़ी थी। ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी। उसने खुद से कहा, “शायद वक्त सिखाने आया था कि लोगों को नहीं, उम्मीदों को टाइम पर रखना चाहिए।”
वह मुस्कुराई। तभी उसके फोन में मैसेज आया —
“अमन: Next time, I’ll be 10 minutes early. Promise!”
दीप्ति ने रिप्लाई किया, “That’s the real celebration 😊”
उसने कार में बैठते हुए आसमान की ओर देखा। सूरज डूब रहा था, लेकिन उसके भीतर की उदासी धीरे-धीरे ढलने लगी थी।
उसे लगा कि कभी-कभी इंडियन टाइमिंग सिर्फ देर से आने की आदत नहीं होती, बल्कि यह हमारे रिश्तों में समय की कीमत भूल जाने की कहानी बन जाती है।
कुछ हफ्तों बाद दीप्ति ने फिर एक छोटी-सी पार्टी रखी। उसने पहले जैसा ही मेसेज भेजा — “Please come by 3 pm sharp.”
और इस बार जब उसने घड़ी देखी, तो पहला मेहमान 2:55 पर आ चुका था।
दीप्ति मुस्कुरा दी। शायद अब सबने समझ लिया था कि समय की कीमत सिर्फ घड़ी में नहीं, भावनाओं में होती है।
(काल्पनिक रचना)
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