“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
सब कुछ पाकर भी ख़ाली
लैला के मरने से जनता का सारा समर्थन बशीर को मिल गया और वो भारी संख्याओं से जीत हुई थी और वो मंत्री पद अपने नाम करवा लिया था।
बशीर ने जो भी चाहा था पा लिया था।
दौलत।
शोहरत।
मुकाम।
मगर इतना कुछ पाने के लिए उसको अपने सारे सच्चे रिश्तों से हाथ धोने पड़े थे।
ऐसा कोई एक रिश्ता भी उसके पास नहीं बचा था जिसको वो अपना कह सके।
सब कुछ पाकर भी आज वो बिल्कुल ख़ाली दामन हो गया था।
नींद थी कि गोली खाने के बाद भी मुश्किल से ही आती थी।
आलिशान महल था, आराम था, दौलत थी, शोहरत थी—लेकिन सुकून नहीं था।
बशीर को जमीला की बातें बहुत याद आतीं…
वो कहती थी—
“सियासत एक दलदल है। आप मत जाइए, गए तो निकल नहीं पाओगे…”
उसकी बातें बिल्कुल सही साबित हुई थीं।
अब वो चाहकर भी इस दलदल से निकल नहीं सकता था।
जिस रास्ते को उसने अपनी कामयाबी की सीढ़ी समझकर चुना था, वही रास्ता अब उसके चारों ओर दीवार बन चुका था।
जिस भाई-बहन के लिए उसने संघर्ष शुरू किया था, उन्हीं से रिश्ते टूट गए।
जिस दोस्त ने उसे शहर तक पहुँचाया था, उसी को पीछे छोड़कर वह आगे निकल गया।
जिस औरत को जीवनसाथी बनाकर घर लाने का सपना देखा था, उसी को उसने अपनी महत्वाकांक्षा की कीमत बना दिया।
और जिस मंज़िल को पाने के लिए उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी थी, वहाँ पहुँचकर उसे एहसास हुआ कि मंज़िल पर उसके साथ चलने वाला कोई नहीं बचा।
अब इस सच्चाई को उसने क़ुबूल कर लिया था।
बशीर उठा और फिर खिड़की में जा खड़ा हुआ।
बाहर वही रात थी।
वही चाँद था।
वही ठंडी हवा थी।
लेकिन बशीर बदल चुका था।
उसने आँखें बंद कीं तो उसे अपना गाँव दिखाई दिया।
जूट की वही चटाई…
दोनों बहनों के चेहरे…
जमीला की आवाज़…
सकीना की नाराज़ आँखें…
रजनीश का दोस्ताना हाथ…
और फिर लैला…
लैला के ख़यालों में खोते हुए बशीर की आँखें भर आईं।
कभी जिस नींद के लिए उसके पास समय नहीं था, आज वही नींद उसकी सबसे बड़ी तलाश बन चुकी थी।
कभी उसने सोचा था कि दौलत और शोहरत उसे सुकून देंगी।
मगर अब उसे समझ में आ चुका था—
इंसान दुनिया की सारी बुलंदियाँ हासिल कर ले, लेकिन अगर रास्ते में अपना ज़मीर, अपने रिश्ते और अपना सुकून खो दे, तो उस बुलंदी का अर्थ क्या रह जाता है?
बशीर देर तक खिड़की में खड़ा रहा…
और फिर लैला के ख़यालों में खो गया और अपने नए मुकाम के बारे में सोचने लगा।
(काल्पनिक रचना)