हंसी, तंज और सच्चाई का संगम — एक व्यंग्य जो हर गृहस्थ के दिल में दीप जला देगा
यशवन्त कोठारी, जयपुर
सारांश :
यह व्यंग्य गृहलक्ष्मियों और लक्ष्मीजी के बीच एक मज़ेदार लेकिन तीखी तुलना करता है। लेखक घरेलू जीवन के संघर्षों, स्त्री के श्रम और पुरुष मानसिकता पर हास्य के माध्यम से करारा प्रहार करते हैं। हंसी-ठिठोली के बीच यह रचना आधुनिक गृहस्थी की गहराई और गृहलक्ष्मी के असली ‘महत्व’ पर सोचने को मजबूर करती है।आइए, इस मजेदार रचना का भरपूर आनंद लें विस्तार से—
दीपावली के महीने मे गृहलक्ष्मियों का महत्व बहुत ही अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि वे अपने आपको लक्ष्मीजी की डुप्लीकेट मानती हैं । लक्ष्मी और गृहलक्ष्मी दोनों खुश हो तो दिवाली है, नहीं तो दिवाला है, और जीवन अमावस की रात है ।
सोचा इस दीपावली पर गृहलक्ष्मी पर एक सर्वेक्षण कर लिया जाये क्योंकि अक्सर मेरी गृहलक्ष्मी अब मायके जाने की धमकी देने के बजाय हड़ताल पर जाने की धमकी देती है । क्या इस देश की गृहलक्ष्मियों को हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक अधिकार है ? और यदि है तो यह अधिकार किसने, कब और क्यों दिया ?
लक्ष्मीजी तो पुरूष पुरातन की वधु है, उनका चंचला होना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी है । मगर सामान्य गृहलक्ष्मी हड़ताल की बात करें तो मन में संशय पैदा हो जाता है आखिर वे चाहती क्या हैं । अपनी गृहलक्ष्मी से पूछा तो वे भभक पड़ीं ।
क्या आराम का अधिकार केवल पुरूषों की ही जागीर है । हम लोग आराम नहीं कर सकतीं । मैंने विनम्रता पूर्वक निवेदन किया।
आराम करना आपका जन्म सिद्ध अधिकार है, मगर दीपावली के शुभ मौके पर यह अशुभ विचार । वे फिर क्रोध से बोल पड़ीं ।
तुम तो लक्ष्मी के वाहन के लायक भी नहीं हो । मगर फिर भी सुनों ।
सारे साल हम काम करते हैं । अब अगर दीपावली पर दो दिन आराम करना चाह रहे हैं तो तुम्हारा क्या बिगड़ जायेगा । फिर हम कोई बोनस, डी.ए. तो मांग नहीं रहे हैं, केवल आराम की बात कर रहे हैं ।
मगर देवीजी आराम तो हराम है ।
तो बस इसे हराम की कमाई ही समझो और तुम जानते हो हलाल से हराम की कमाई का महत्व बहुत ज्यादा है ।
वो तो ठीक है मगर काली लक्ष्मी रूठ गई तो सब गुड़ गोबर हो जायेगा ।
अब काली रूठे या सफेद । हम तो भई चले हड़ताल करने ।
यह कहकर देवीजी तो आराम करने चली गयीं । मैंने फिर एक अन्य गृहलक्ष्मी से आराम और हड़ताल पर विचार जाने ।
वे पढ़ी लिखी थीं । सब्जी खरीद रही थीं । टमाटर पर कददू रख रही थीं और खील बाताशांे पर दीपक रख कर सुखी हो रहीं थी।
मेरा प्रश्न सुनकर पहले मुस्कराई, फिर अधराई और अन्त में कोयल की तरह कूक पड़ी ।
भाई साहब । ईश्वर आपके मुंह में घी-शक्कर डाले नेकी और पूछ पूछ कर, अरे भाई यहां तो दफ्तर से छुट्टी तो घर में पिसों । घर से छूटो तो दफ्तर में फाईलों में सर खपाओ । दोनों से छूटों तो पति और बच्चों के मामले देखो । अगर कहीं दुनिया में नरक है तो वो औरतों के भाग्य में ही है, भाई साहब ।
मैंने दिलासा देने की गरज से कहा-अगर आप कुछ दिनों के लिए हड़ताल पर चली जाएं तो ।
भई वाह मजा आ गया क्या ओरिजिनिल आइडिया है । मगर एक बात बताओ भाई साहब ।
ये भाई सहाब । भाई साहब । शब्द सुनते-सुनते मेरे कान पक गये थे सो मैं भाग खड़ा हुआ ।
इस बार सोचा एक गृहलक्ष्मा से बात करें । सुनते ही वो तमक कर बोल पड़े । अमां यार तुम भी निरे मूर्ख हो । गृहलक्ष्मियां अगर काम नहीं करेगी तो हम सब खायेंगे क्या ? तुम पूरे देश के घरों की व्यवस्था बिगाड़ने का षडयंत्र कर रहे हो देखो मुझे लगता है तुम्हारे पीछे किसी विदेशी एजेन्सी का हाथ लगता है । देखो प्यारे चुपचाप घर जाओ, एक दीपक जलाओ और गृहलक्ष्मी के हाथ की बनी चाय पीकर सो जाओ ।
लेकिन मुझे तो गृहलक्ष्मियों के जीवन के सर्वेक्षण का बुखार चढ़ा हुआ था । सो मैं उस गृहलक्ष्मा की नेक राय क्यों मानता । मैंने सर्वेक्षण करने वालों की तरह दो सेंटीमीटर मुस्कान चेहरे पर चिपकाई और सर्वेक्षण के अगले दौरे हेतु कुछ ऐसे लोगों को पकड़ा जो रोज गृहलक्ष्मियों को भुगतते हैं और आठ-आठ आंसू रोते हैं ।
सबसे पहले मैंने शहर के मिनी बसों के कण्डक्टरों से पूछा-गृहलक्ष्मी के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं ?
क्रमश:
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shandar dhardar