कृष्ण प्रेम से जीवन दर्शन तक – शबनम की रचनाओं में भक्ति, भाव और अनुभवों का संगम
शबनम मेहरोत्रा , कानपुर
सारांश:
इन कविताओं में शबनम मेहरोत्रा की रचनात्मक आत्मा झलकती है — कहीं कान्हा से अटूट प्रेम का भाव है, कहीं लोकगीतों की झंकार और कहीं जीवन का गूढ़ दर्शन। “कन्हैया देते रहना साथ” में भक्ति की ममता है, “झूमटा” में लोकधुन की मिठास और “छठ” व “निर्गुण” में जीवन का दार्शनिक सत्य। प्रेम, आस्था, प्रकृति और समय के बीच संतुलन का सुंदर संदेश देने वाली इन रचनाओं का अब आनंद लें विस्तार से—
कन्हैया (गीत)
कन्हैया देते रहना साथ ,
कन्हैया देते रहना साथ ।
साथ न छुटे ,हाथ न छूटे,
हो पूनम की रात ,
कन्हैया देते रहना साथ
मैं तो बावरी हो गई कान्हा
सुध बुध हूँ बिसराई,
बन्ध गई तेरी बंसी की धुन
देती जब है सुनाई
ओ कान्हा पूछ न मेरी बात
हाथ न छुटे ,साथ न छूटे
हो पूनम की रात ,,कन्हैया,,,,
उम्र न देखी,न तन देखा
न देखा तेरा धन
चाहे तुम में गुण निर्गुण हो
बन्ध गया तुमसे मन
मेरी जान की ले सौगात,
कन्हैया देते रहना साथ
हाथ न छुटे साथ न छुटे
हो पूनम की रात ,,कन्हैया
चाहे आलिंगन में तू भरले
या निहरे मेरा रूप,
मैं तो तेरी जोगन बन गई
छाँव में रख या धूप
“शबनम” का गर हाथ
कन्हैया देते रहना साथ
कन्हैया देते रहना साथ
साथ न छुटे ,हाथ न छुटे
हो पूनम की रात ,,कन्हैया ,
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झूमटा (लोकगीत)
वृंदावन की कुंज गली में
रास रचाए नंदलाल
हाय राम रास रचाए नंदलाल
हाय राम ग्वाल बालाएँ नाचे
छमछम ग्वाले बजाए करताल
कान्हा की मुरली राधा की पायल
दोनों बजे बड़ी जोर
हाय राम दोनों बजे बड़ी जोर
हाय राम किसको पता की सबके
दिलों में बैठा है नंदकिशोर
रास रचाए सब कुछ भुलाएँ
सुख दुख की चिंता छोड़
हाय राम सुख दुख की चिंता छोड़
हाय राम कान्हा की बंसी का है आकर्षण सब कुछ आई है छोड़
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छठ (कविता)
जो स्थिर है उसका उदय और कैसे
होगा अस्त
ये पृथ्वी ही उनके चक्कर में रहती
अति व्यस्त
पृथ्वी के घूर्णन से हम सब को सत्य
ये लगती बात
अस्ताचल उदयाचल से ही होता है
दिन रात
तर्क वितर्क में न भी जाए तब भी सिद्ध
ये बात
कर्म से लक्ष्य से की सिद्धि मिलती कर्म
करो दिन रात
अस्ताचल यह सूर्य सिखाता वृद्ध को दो
सम्मान
यही सूर्य उदयाचल काल में देगा सुखद
परिणाम
सूर्योदय सूर्यास्त में जीवन जीने का है
दर्शन
शबनम ये फलसफा वो समझा जिसने
किया मनन
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निर्गुण (दोहे)
उमरिया निश दिन ढलती जाय,
उमरिया निश दिन ढलती जाय
उम्र की पूंजी ज्यों ज्यों घाटे ये
काया सिमटती जाय ,,,
उमरिया निस दिन
उम्र की पूंजी बचते बचते कर लो सदुपयोग
वरना अग्नि भस्म करेगी आएगा वह भी योग
हरेक दिवस पर काल के जबड़े काया सरकती जाय ,,,
उम्र की पूँजी
धन दौलत सब रह जाएगी धरी रहेगी अटारी
कल जब आएगा ले जाने करके भैसा सवारी
इस काया का छाया तक न संग लिपटती जाए ,,,,
उम्र की पूंजी
सदकर्मो से लोगों का दिल जीत सको तो जीत
नाम रहेगा पीछे तेरे लोगो को बाँटो प्रीत
शबनम ऐसा कर वर्षों , कुछ नैन बरसते जाए ,,,
उम्र की पूंजी
उमरिया निश दिन ढलती जाय ,
उमरिया निश दिन ढलती जाय
One Comment
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कवयित्री को बहुत आभार।