“चाह, शब्द और साधना—जहाँ कविता संकल्प बन जाती है।”
पंकज शर्मा “तरुण “, मंदसौर (मध्य प्रदेश)
चाह हो तो (गीतिका)
चाह हो तो आसमान में छेद किया जा सकता है।
दुश्मन के खेमे में घुसकर भेद लिया जा सकता है।।
जज्बातों से परे जीत का परचम लहराता है।
तूफानों के मंसूबों का रुख मोड़ा जा सकता है।।
गर्म खून ने फिरंगियों को देश से खदेड़ा था।
चाह हो आजादी की अंगारों पर दौड़ा जा सकता है।।
गेसुओं के छल्लों में खुद को मत उलझाओ।
फौलादी प्रण से चट्टानों को तोड़ा जा सकता है।।
छोड़ दो कायरता को तुम वक्त नहीं दुबकने का।
चाह हो तो भाई आलस को त्यागा जा सकता है।।
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भावों का सागर (गीतिका)
है प्यार भरा जिसके दिल में,भावों का सागर लहराए।
गीत सुना रोते बालक को,पल भर में ही जो बहलाए।।
सीमा पर जो प्रहरी बैठा,तन मन से रक्षा में रत है।
अपनी ओजस्वी वाणी से,साहस वीरों को दिलवाए।।
देश प्रेम की सरित बहा दे,अपने ही छंदों दोहों से।
पल में पत्थर को पिघला दे,गीतों से अरि को दहलाए।।
छेद गगन में जो करवा दे,पत्थर तुम एक उछालो तो।
शब्दों के जो तीर चलाता,कविता का कवि वह कहलाए।।
तख्त पलट दे ताज बदल दे,अंदाज बदल दे जीने का।
तुलसी कबीर सम यह दृष्टा,महा कवि वह बन जाए।।
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रचना (गीतिका)
सरस सरल मधु मय कर रचना।
चल सब यह रच सच कर सपना।।
नयन धनुष सम लट लिख बदरा।
प्रण कर तप कर हर हर जपना।।
रग ~रग रच बस जब यह सकता।
व्यसन सजन तुम मत फिर करना।।
हिम परबत पर शिव हर बसते।
निस दिन बस तुम हर हर भजना।।
मम शिव रक्षक सकल जग करता।
यह सच हम सब यम मुख लगना।।