— परंपरा, प्रेम और परिवार का उत्सव
यशवन्त कोठारी, जयपुर
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, यह भारतीय संस्कृति की हजारों वर्षों पुरानी परंपराओं, साहित्य, कला और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। यदि हम प्राचीन ग्रंथों की ओर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि आज जिसे हम “होली” कहते हैं, उसका मूल स्वरूप “मदनोत्सव”, “बसंतोत्सव” और “कामदेवोत्सव” के रूप में मनाया जाता था।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध नाटक मृच्छकटिकम् में बसंत और उत्सवों का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार हर्ष चरित तथा सम्राट हर्ष के नाटक रत्नावली और नागानंद में ऋतु-उत्सव का सुंदर वर्णन है।
महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथ ऋतुसंहार में बसंत ऋतु का मनोहारी चित्र खींचा है। उनके अनुसार बसंत का आगमन केवल प्रकृति में नहीं, बल्कि मन और संबंधों में भी नई ऊर्जा भर देता है। खेतों में गेहूं, जौ और सरसों की बालियां लहराती हैं, गुलमोहर और सेमल के वृक्ष दहक उठते हैं, और वातावरण में उल्लास की गूंज सुनाई देती है।
🌸 मदनोत्सव से होली तक
प्राचीन भारत में मदनोत्सव के अवसर पर कामदेव और रति की पूजा की जाती थी। राजा से लेकर सामान्य नागरिक तक इस उत्सव में समान रूप से भाग लेते थे। कहीं गीत-संगीत होता, कहीं नृत्य और स्वांग, तो कहीं हास-परिहास के आयोजन।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’ में इन उत्सवों की सांस्कृतिक गरिमा का उल्लेख किया है। इन आयोजनों में उन्मुक्तता थी, पर अशालीनता नहीं; आनंद था, पर मर्यादा भी थी।
शांति निकेतन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सान्निध्य में दोलोत्सव के रूप में बसंतोत्सव मनाया जाता था। वहाँ रंग, संगीत और नृत्य के माध्यम से प्रकृति और मानव के मधुर संबंधों का उत्सव मनाया जाता था।
इसी प्रकार भगवान कृष्ण की रासलीला ने होली को भक्ति और प्रेम का नया आयाम दिया। राधा-कृष्ण के प्रेम चित्रों ने होली को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति बना दिया।
🎨 कला, साहित्य और संस्कृति में होली
प्राचीन मूर्तिकला, चित्रकला और स्थापत्य में भी बसंत और कामोत्सव के दृश्य अंकित मिलते हैं। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से ही ऐसे प्रमाण मिलते हैं। मुगल काल में भी चित्रकला में श्रृंगार और बसंतोत्सव प्रमुख विषय रहे।
संस्कृत ग्रंथों में हास-परिहास, रास-नृत्य, लोकगीत, झूले और उत्सवों का उल्लेख मिलता है। यह सब सीमित समय और मर्यादित आचरण के साथ होता था। उस समय का उत्सव निश्छल और सामूहिक था, आज की तरह भौंडे प्रदर्शन का माध्यम नहीं।
🌈 तब और अब का अंतर
समय के साथ होली का स्वरूप बदला है। कहीं-कहीं असंयम, अशालीनता और आपसी कटुता ने इस पवित्र पर्व को प्रभावित किया है। सांप्रदायिकता और सामाजिक विभाजन ने भी इसकी आत्मा को आहत किया है।
परंतु प्रश्न यह है—क्या उल्लास की ध्वनि कभी दब सकती है? क्या रंगों की उमंग को कोई रोक सकता है?
उत्तर है—नहीं। क्योंकि होली हमारी सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न अंग है। यह हमें बताती है कि जीवन में प्रेम, समानता और सहअस्तित्व ही सर्वोपरि हैं।
👨👩👧👦 परिवार और समाज के लिए संदेश
आज आवश्यकता है कि हम होली को उसके मूल स्वरूप में, परिवार और समाज के साथ मिलकर, शालीनता और मर्यादा के साथ मनाएं।
- किसी पर जबरदस्ती रंग न डालें।
- अपशब्दों और अभद्र व्यवहार से बचें।
- प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें।
- बुजुर्गों और बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखें।
- समाज में सद्भाव और भाईचारे का संदेश फैलाएं।
होली का वास्तविक अर्थ है—मन के मैल को धोना, रिश्तों में जमी धूल को साफ करना और प्रेम के रंग में सबको रंग देना।
आइए इस होली पर संकल्प लें कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देंगे और आने वाली पीढ़ी को एक शालीन, स्नेहमयी और पारिवारिक होली का उपहार देंगे।