हंसी, तंज और सच्चाई का संगम — एक व्यंग्य जो हर गृहस्थ के दिल में दीप जला देगा
यशवन्त कोठारी, जयपुर
सारांश :
यह व्यंग्य गृहलक्ष्मियों और लक्ष्मीजी के बीच एक मज़ेदार लेकिन तीखी तुलना करता है। लेखक घरेलू जीवन के संघर्षों, स्त्री के श्रम और पुरुष मानसिकता पर हास्य के माध्यम से करारा प्रहार करते हैं। हंसी-ठिठोली के बीच यह रचना आधुनिक गृहस्थी की गहराई और गृहलक्ष्मी के असली ‘महत्व’ पर सोचने को मजबूर करती है।आइए, इस मजेदार रचना के आखिरी चैप्टर का भरपूर आनंद लें विस्तार से—
…सबसे पहले मैंने शहर के मिनी बसों के कण्डक्टरों से पूछा-गृहलक्ष्मी के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं ?
जो गृहलक्ष्मी बिना हील-हुज्जत के पूरे पैसे दे देती है, वही गृहलक्ष्मी अच्छी है जो झिकझिक करती है, मैं उसे रास्ते में ही उतार देता हूं और तुम पैसे निकालो ।
मैंने कण्डक्टर को पैसे दिये और उतर गया ।
बस कण्डक्टर से अपमानित होकर जब मैं नीचे उतरा तो एक आलीशान भवन के सामने एक आदमी खड़ा था मैं समझ गया यह बिल्डिंग बैंक की होगी और यह आदमी हर्षद मेहता की श्रेणी का । मैंने विनम्रतापूर्वक पूछा ।
गृहलक्ष्मी के बारे में आप क्या सोचते हैं ? वो धीरे से बोला ।
अपनी गृहलक्ष्मी के अलावा सब गृहलक्ष्मियां अच्छी लगती हैं ।
ये कहकर वो हो हो कर हंसने लगा मैं भी उसके साथ हंसने लगा फिर हम दोनो हंसने लगे । अब मैंने पूछा-
बैंक में जो गृहलक्ष्मियां आती है, उनके बारे में आप क्या सोचते है यदि वे हड़ताल कर दे तो ?
देखो दोस्त लॉकर खोल कर खुला छोड़ जाये वही गृहलक्ष्मी अच्छी होती है । और फिर यदि बैंको में हड़ताल हो तो देश के कामकाज का क्या होगा । वैसे गृहलक्ष्मी हड़ताल करे यह तो बात ठीक नहीं ।
यह ज्ञान लेकर मैं घर आ गया ।
इधर घर की गृहलक्ष्मी किराने वाले को महंगाई पर शषण सुनाकर आई थी और देश, सरकार, दूकानदार आदि को कोस रही थी । सोचा दूकानदारों से भी गृहलक्ष्मियों के बारे मेूं पूछना चाहिए । सभी दूकानदारों ने एक स्वर में कहा जो गृहलक्ष्मी बिना भाव ताव किये सामान खरीदकर ले जाती है, वही गृहलक्ष्मी श्रेष्ठ होती है । ऐसा व्यापार लक्ष्मी का कहना है ।
लेकिन गृहलक्ष्मी सर्वेक्षण प्रकरण में जब तक हारी बिमारी नहीं हो तो सर्वेक्षण का मजा ही क्या सो एक वैधराज से पूछा ।
रोगी गृहलक्ष्मियों से आप कैसे निपटते हैं ?
बस जरा-सी सहानुभूति, कुछ आत्मीयता और फिर वे खुलकर सास, ननद, जेठानी, देवरानी के किस्से सुनाने लग जाती हैं ।
अच्छा फिर उनके रोग का क्या होता है ?
रोग केवल मन की भड़ास निकालने का होता है । भड़ास निकली और सब कुछ ठीक हो जाता है । फीस मिलती है सो अलग ।
यदि गृहलक्ष्मी हड़ताल कर दे तो ?
वैधजी यह सुनकर बेहोश हो गये । वैधजी को छोड़कर एक रिक्शे वाले से पूछा ।
प्यारे भाई गृहलक्ष्मी के बारे में क्या सोचते हो वो छूटते ही बोला ।
चौपड़ से चौपड़ तक 2 रूपये लगेंगे काहे की लक्ष्मी और काहे की गृहलक्ष्मी चलना है तो चलो नहीं तो अपना रास्ता नापो । रिक्शावाले से बचते बचाते गृहलक्ष्मियों की चिंता करते सोचा किसी विधुर से भी राय कर लूं । एक विधुर मिला बोला ।,
ईश्वर बचाये गृहलक्ष्मी से । बड़ी मुश्किल से जान छूटी है । मेरी गृहलक्ष्मी तो स्थायी हड़ताल पर है । तुम अपनी खैर मनाओ और चाहो तो मेरी बिरादरी में शामिल हो जाओ । मगर मेरे ऐसे भाग्य कहां ।
लगे हाथ एक कुंवारे से भी पूछा बैठा । भाई गृहलक्ष्मी के बारे में आप क्या सोचते हो ।
लड़का नयी उमर का था मसें भीग रहीं थीं, मूंछे निकल रही थीं बोल पड़ा ।
गृहलक्ष्मी मैं क्या रखा है अंकल ! कोई लक्ष्मी पुत्री हो तो बताओ मैं समझ गया यहां से बचो ।
लेकिन अभी मेरा काम बाकी था सोचा भारतीय संस्कृति में गृहलक्ष्मी को ढूंढू मगर वहां तो सब गृहलक्ष्मियां लक्ष्मीजी की आरती में व्यस्त थीं । हड़ताल पर जाने की धमकी देने वाली गृहलक्ष्मी भी लक्ष्मीजी की पूजा अर्चना कर रही थी ।
सब सोच मैंने भी गृहलक्ष्मी की शरणम् गच्छामि होना ही उचित समझा । सो हे पाठक ! इस लक्ष्मी पूजन पर अपनी गृहलक्ष्मी को भी सम्मान दें और सुखी रहंे ।
(काल्पनिक रचना)