“सपने उम्र नहीं देखते… बस वक्त मांगते हैं थोड़ी हिम्मत और थोड़ा ह्यूमर!”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश:
भारत की महिला क्रिकेट टीम की जीत से प्रेरित होकर एक आम गृहिणी अपने भीतर की खिलाड़ी को जगाती है।
हास्य, व्यंग्य और आत्मसम्मान से भरी यह कहानी बताती है कि सपने किसी उम्र के नहीं होते। अम्मा का बल्ला समाज के पुराने सोच पर सबसे बड़ा चौका मार देता है।पर कैसे ?आइए जानें इस हास्य—व्यंग्य के जरिए विस्तार से—
रविवार की दोपहर थी। भारत की महिला क्रिकेट टीम ने साउथ अफ्रीका को हराकर विश्वकप जीत लिया था। मोहल्ले के सब लोग टीवी के सामने ऐसे बैठे थे जैसे इंडिया के साथ उनकी बहू भी फाइनल खेल रही हो।
“देखो-देखो! क्या चौका मारा है झूलन दीदी ने!” — अम्मा ने सोफे से उछलकर कहा और पड़ोसी शर्मा जी की प्लेट में पड़े समोसे गिरा दिए।
पूरा मोहल्ला झूम उठा, लेकिन असली आतिशबाज़ी तो अम्मा के अंदर फूट पड़ी थी। अगले ही पल उन्होंने घोषणा कर दी —
“अब मैं भी क्रिकेट खेलूंगी!”
सारा घर थम गया।
पापा ने चश्मा नीचे खिसकाते हुए पूछा — “तुम? क्रिकेट?”
अम्मा बोलीं — “हाँ, क्यों? जब इंडिया की बेटियाँ खेल सकती हैं, तो मोहल्ले की भी क्यों नहीं?”
बस फिर क्या था! अगले दिन मोहल्ले के पार्क में “लेडीज क्रिकेट क्लब” का गठन हुआ — कप्तान अम्मा और कोच बनीं भाभी रेनू, जिनका क्रिकेट ज्ञान सिर्फ इतना था कि “गेंद बैट से लगती है तो रन बनता है।”
पहले मैच की तैयारी जोरों पर थी। अम्मा ने किचन में सब्ज़ी काटने वाले चाकू की जगह बल्ला पकड़ा और बोलीं — “अब ये हाथ सिर्फ रोटी नहीं, रिकॉर्ड बनाएंगे!”
सुबह-सुबह पार्क में रिहर्सल शुरू हुई। पहली बॉल आई — अम्मा ने आँख बंद कर के मारा और गेंद सीधे बगल वाले तिवारी जी के अचार के डब्बे में जा गिरी।
तिवारी जी गरजे — “ये खेल है या किचन क्रांति?”
अम्मा बोलीं — “क्रांति ही तो है तिवारी जी! महिलाएँ अब बस घर नहीं, मैदान भी संभालेंगी।”
धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले की महिलाएँ जुड़ गईं — कोई अपनी साड़ी की पिन निकालकर हेलमेट बांध रही थी, कोई झाड़न को बल्ले की तरह घुमा रही थी। बच्चों ने तो नया नारा बना दिया —
“रोटी बेलो या बॉल मारो, अम्मा हैं हमारी हीरो!”
मैच का दिन आया। सामने पुरुषों की टीम थी — “सुपर ससुराज़ इलेवन।”
पहली बॉल फेंकी गई — अम्मा ने ऐसा चौका जड़ा कि गेंद जा गिरी शर्मा जी की छत पर।
सारा मोहल्ला चिल्ला उठा — “अम्मा जिंदाबाद!”
पापा भी तालियाँ बजा रहे थे, लेकिन डर के मारे बोले — “शाबाश… पर खाना कौन बनाएगा?”
अम्मा मुस्कराईं — “आज से जिम्मेदारी बाँटनी होगी, क्योंकि ‘टीम इंडिया वाइफ्स इलेवन’ अब पीछे नहीं हटेगी!”
मैच खत्म हुआ, लेकिन कहानी नहीं। अगले दिन अखबार की सुर्खी थी —
“मोहल्ले की गृहिणियों ने मारी जीवन की सेंचुरी — घर और मैदान दोनों में!”
अब अम्मा हर सुबह बल्ला लेकर कहतीं — “ये मेरी आज़ादी की चौकड़ी है।”
बेटियाँ गर्व से देखतीं, पड़ोसी सोचते, और पापा बर्तन धोते हुए गुनगुनाते —
“अरे वाह, अब तो घर में भी इंडियन प्रीमियर लीग लग गई है!”
व्यंग्य यही है कि अम्मा का यह सपना मज़ाक से शुरू हुआ था, लेकिन जब उन्होंने अपने भीतर की शक्ति पहचानी, तो हर मोहल्ले की औरत को एक नया जोश मिला।
क्योंकि असली जीत तो वही है — जहाँ स्त्री की गरिमा सुरक्षित रहे और उसके सपने खुलकर खेलें!!
(काल्पनिक रचना)