“न्यायपूर्ण वसीयत ही परिवार को टूटने से बचाती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
“… और बेटी को? ” रतनलाल ने पूछा।
“उसे बंगले का पिछला हिस्सा दे दें और अपने जमा धन का कुछ प्रतिशत गुजारे के लिए दे दें। “
चन्द्रप्रकाश तो चले गये लेकिन उनकी सलाह से रतनलाल संतुष्ट नहीं हो पाए। रतनलाल को मालूम था कि बड़ा बेटा अत्यधिक महत्वाकांक्षी था और भविष्य में वह छोटे बेटे को दगा देकर उसका हक हड़प लेगा। छोटा बेटा जो शुरू से ही विवाद से दूर रहना चाहता है, बड़ी आसानी से अपना हक छोड़ देगा और एक दिन बड़ा बेटा पूरे बंगले पर भी हक जमा कर बहिन और छोटे भाई को निकाल देगा। इसी चिंता में दिन गुजरते गये परंतु रतनलाल को इस समस्या का कोई निदान नहीं मिला। इस बीच एक दिन उनके सीने में दर्द उठा और उन्हें कुछ रोज हॉस्पिटल में रहना पड़ा। डॉक्टर का कहना था कि ये माइनर हार्ट अटैक था। उन्होंने स्वस्थ होने पर अपने वकील चंद्र प्रकाश को बुलाया और अपने विचार के अनुरूप वसीयत लिखवाकर अपने दस्तखत कर दिये। उन्होंने कहा कि ये वसीयत तब ही परिवार के सदस्यों को बताना जब मैं न रहूँ। चंद्र प्रकाश जी वसीयत लेकर चले गये।
साहिल और उसकी पत्नी सुलेखा जो तन्मयता से पिताजी की देखभाल कर रहे थे और पिताजी से मिलने के लिए किसी को भी उनके कमरे में नहीं आने दे रहे थे। कुशल और उसकी पत्नी रागिनी और बहिन शालिनी को भी बहुत कम मिलने दिया जा रहा था। उसी दौरान साहिल ने वसीयत का मजमून टाइप करवा लिया था जिस पर वह रतनलाल के हस्ताक्षर लेना चाहता था। उस वसीयत में उसने रतनलाल की सारी मिल्कियत मय कंपनी, बंगले और बैंक बैलेंस का स्वाभाविक दावेदार स्वयं को बताया था जिसके अंतर्गत छोटा भाई कुशल कंपनी में मैनेजर की हैसियत से कार्य करेगा और महीने में पगार पायेगा। बहिन शालिनी को एक फ्लेट दे दिया जायेगा और गुजारे भत्ते में एक निश्चित मासिक राशि दे दी जायेगी।
साहिल को लग रहा था कि यदि एक और हार्ट अटैक पिताजी को आ गया तो वे निश्चित ही ईश्वर को प्यारे हो जायेंगे अत: उसने पिताजी को मनाया कि वे जल्द से जल्द वसीयत के उस मजमून को स्वीकृत कर दें ताकि कानूनन वसीयत बनवाकर उनके हस्ताक्षर लिए जा सकें। रतनलाल ने आँखें मूंद कर साहिल से मजमून पढ़कर सुना देने के लिए कहा। साहिल पढ़ने लगा और वे सुनते-सुनते सो गए। उसने पिताजी की जगाया पर वे कभी न टूटने वाली निद्रा में खो चुके थे।
रतनलाल के अंतिम संस्कार के बाद साहिल ने अंकल चंद्रप्रकाश को बुलाया और सारी बात बताते हुए उनसे कानूनी सलाह मांगी। चंद्रप्रकाश ने कहा कि रतनलालजी पहले ही वसीयत लिखवा गये हैं जो इस प्रकार है:-
वसीयत के अनुसार बेटी शालिनी कम्पनी की मालकिन होगी और दोनों बेटे साहिल और कुशल क्रमश: मार्केटिंग निदेशक एवं फाइनेंस निदेशक होंगे जिनको पगार मिला करेगी और कम्पनी की ग्रोथ के हिसाब से उसमें बढ़ोतरी मिलती रहेगी। बंगले में सभी की बराबर की हिस्सेदारी होगी अत: कोई किसी को बाहर का रास्ता नहीं दिखा सकेगा। चंद्रप्रकाश जी ने सबके सामने वसीयत पढ़ डाली। सबके मुँह अवाक रह गए। चूंकि वसीयत एक लीगल डॉक्यूमेंट बन चुका था, साहिल को न चाहते हुये भी इसे मंजूर करना पड़ा। कुछ औपचारिकताओं के बाद शालिनी ने सीईओ का पदभार संभाल लिया।
(काल्पनिक रचना )
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