“समर्पण से साधना तक: भगिनी निवेदिता का अद्भुत भारतीय जीवन”
श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
लक्ष्मीरह्ल्या चनम्मा रुद्र्माम्बा सुविक्रमा |
निवेदिता सारदा च प्रणम्या मातृदेवता ||
भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है, उनमें भगिनी निवेदिता का नाम प्रथम पंक्ति में है, स्वामी विवेकानंद के उदात्त जीवन दृष्टिकोण, वीरोचित व्यवहार, स्नेहकर्षण ने उनके मन में यह बात स्थिर हो गई कि भारत ही उनकी कर्मभूमि है, जिसे बड़ी तन्मयता से जीवन पर्यंत माना। हिन्दू धर्म और भारतीय संस्कृति की आधारशीला आध्यात्मिकता और गहन प्रकृति अध्ययन की नींव पर स्थापित है, जिसमें जीवन की सार्थकता एक प्रबल लक्ष्य को कर्म के आधार पर निर्धारित करती है। इसका प्रभाव पश्चिमी गोलार्ध पर समझना हो तो स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता, गुरु द्वारा प्रदत्त उनके नाम का अर्थ ही ईश्वर को समर्पित होता है, को समझना इसे चरितार्थ करेगा, जिन्होंने भारतीय इतिहास में महिला उत्कर्ष, शिक्षा तथा संस्कृति में उनके स्थान का गहन अध्ययन कर हिन्दू धर्म स्वीकार किया। सच्चा भारतीय सद्व्यक्ति होना ही सकल ब्रह्मचर्य की सफल अभिव्यक्ति है—इस तथ्य को अपने जीवन द्वारा स्थापित भी किया।
लेडी इसाबेल मार्गेसन स्वामीजी से उनके ओकले स्ट्रीट स्थित निवास पर मिलने वाली पहली व्यक्तियों में से एक थीं। वे स्वामीजी की शिक्षाओं से अत्यंत प्रभावित थीं और उसी वर्ष नवम्बर के एक रविवार को उन्होंने स्वामी जी को अपने निवास 63 सेंट जार्ज रोड पर प्रवचन देने आमंत्रित किया। उपस्थित लोगों में से एक मारग्रेट नोबेल थीं, जो शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक रुचि रखती थीं। वे अपने स्कूल की प्रधान आचार्य भी थीं और सेसम क्लब की एक उत्कृष्ट सदस्य भी थीं, जिसकी लेडी मार्गेन सचिव थीं। लेकिन सुश्री नोबेल ने स्वामीजी के शब्दों का गहन अध्ययन किया; बिना सोचे-समझे स्वीकार करना उनके लिए कठिन था। इसे समझने में उन्हें कई महीने लगे, परन्तु जब विवेकानंदजी इंग्लैंड से विदा ले रहे थे, तब उन्हें अत्यन्त आदर से ‘गुरूजी’ कहा।
अपने जीवन (1867 – 1911) का प्रारम्भ एक संगीत तथा कला को समर्पित स्कॉटिश-आयरिश परिवार में हुआ। पिता सेम्युअल रिचमंड नोबल, जो एक विकासवादी पादरी थे, से प्रेरणा लेकर केवल सत्रह वर्ष की उम्र में एक सफल अन्वेषक, शिक्षक तथा एक सिद्धांतवादी लेखक बन गईं। तीक्ष्ण बुद्धि तथा आध्यात्मिकता उनकी पहचान बन गई। वृहद ज्ञान भंडार तथा गहन आध्यात्मिक अन्तर्दृष्टि के कारण सन 1895 में विम्बलडन में रस्किन स्कूल की स्थापना की। अपने गुरु स्वामी विवेकानंद से उनकी भेंट नवम्बर 1895 में लंदन में हुई। वे उनके ओजस्वी व्यक्तित्व, निर्भीक भाषण शैली और वेदांत के विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें गुरु मान लिया और भारत यात्रा का प्रण साध लिया। अपने पूर्व नाम मार्गरेट एलिझाबेथ नोबल को त्यागकर, अपने गुरु द्वारा प्रदत्त नाम ‘सिस्टर निवेदिता’ से सम्पूर्ण विश्व में एक संत व्यक्ति के रूप में प्रसिद्धि पाई।
25 मार्च 1898 को आपने गुरु स्वामी विवेकानंद से बेलूर मठ में ब्रह्मचर्य की शिक्षा के साथ भगवान बुद्ध के करुणापथ की प्रेरणा लेकर तथा पाश्चात्य जगत की भोगवादी चमक-दमक को सम्पूर्ण जीवन के लिए त्यागकर भारत की सेवा में अपने जीवन को यज्ञ की समिधा समान अर्पित कर दिया।
क्रमश:
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