“न्यायपूर्ण वसीयत ही परिवार को टूटने से बचाती है।”
विजय कुमार तैलंग, जयपुर (राजस्थान)
रतनलाल टैक्सटाइल कंपनी के मालिक थे जो अपने आलीशान बंगले में परिवार के सदस्यों के साथ रहते थे। वह अब काफी उम्रदराज हो गये थे और विधुर भी थे। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। बेटों की शादियां हो चुकीं थी और बेटी तलाकशुदा थी। अपनी प्रोपर्टी को वह सबमें न्यायोचित ढंग से बांटने की खातिर एक वसीयत लिखवाना चाहते थे। वह इसी सोच में रहते थे कि किसको क्या दिया जाए किंतु वह अब तक किसी हल पर नहीं पहुँच सके थे।
बड़ा बेटा साहिल अपनी पत्नी सुलेखा के साथ आये दिन हिल स्टेशनों पर घूमता रहता था। वह पढ़ा लिखा नौजवान था। उसने आई टी कंपनी में वर्क फ्रॉम होम जॉब व्यस्तता के लिए ले रखा था किंतु उसके घूमने फिरने का खर्च रतनलाल के माथे था। इस कारण वह काफी खर्चीला था। रतनलाल चाहते थे कि वह व्यापार में उनकी मदद करे किंतु उसका मत था कि पिताजी कंपनी में उसे मालिक बना दें तब वह व्यापार देखेगा। कहना न होगा कि साहिल की इस सोच की सूत्रधार उसकी पत्नी सुलेखा थी जो स्वयं बड़े घर से आई थी।
छोटा बेटा कुशल कॉमर्स ग्रेजुएट था। वह आत्मस्वाभिमानी और मितव्ययी स्वभाव का था। बड़े भाई की महत्वाकांक्षाओं के चलते वह कोई विवाद में न पड़कर स्वयं को निष्पक्ष रखता था। उसकी सोच में उसकी पत्नी रागिनी भी शामिल थी जो मिडिल क्लास परिवार से आई थी।
इन दोनों भाईयों की एक बड़ी बहिन शालिनी थी। उसका ऊँचे घराने में विवाह हो गया था लेकिन आये दिन दहेज की डिमांड के चलते उसने तलाक़ ले लिया था और रतनलाल ने बेटी को अपने ही परिसर में रहने का स्थान दे दिया था। वह एम. बी. ए. कर चुकी थी। बड़े बेटे की जिद के चलते कि पहले उसे मालिकाना हक दो तब वह कंपनी में दिलचस्पी लेगा, रतनलाल बेटी शालिनी को अपने साथ कंपनी के कार्यों को देखने के लिए ले जाते थे जो साहिल व सुलेखा को नागवार गुजरता था। शालिनी घर के किसी सदस्य से भेदभाव नहीं रखती थी, सबसे उसका मिलनसार बर्ताव था। वह घर की दोनों बहुओं को प्राथमिकता देती थी और किन्हीं विवादास्पद बातों पर ध्यान नहीं देती थी। उसका सबके प्रति आत्मिक रुझान था।
रतनलाल घर के हर सदस्य के स्वभाव और उनके विचारों से बेतरह वाक़िफ़ थे। वे चाहते थे कि उनके रहते वसीयत बन जाये जिससे बाद में कोई विवाद की स्थिति न आये। इसी के चलते उन्होंने एक दिन अपने वकील मित्र चंद्रप्रकाश को बुलाया। चंद्रप्रकाश चूंकि उनके बंगले में आते जाते रहा करते थे अत: वे सभी सदस्यों से परिचित थे और रतनलाल के बेटे व बेटी उन्हें अंकल कहते थे। चंद्रप्रकाश ने रतनलाल का मंतव्य जानकर यह कहा कि वे कंपनी का मालिकाना हक बड़े बेटे को दे दें जो स्वाभाविक दावेदार भी है और छोटे बेटे को उसमें पच्चीस परसेंट का पार्टनर बना दें।
“… और बेटी को? ” रतनलाल ने पूछा।
क्रमश:
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