“समर्पण से साधना तक: भगिनी निवेदिता का अद्भुत भारतीय जीवन”
श्यामकांत देशपांडे, नागपुर
13 नवंबर 1898 में अपने प्रारम्भिक कलकत्ता निवास में उन कन्याओं हेतु
बागबाजार में एक विद्यालय प्रारम्भ किया जिन्हें किसी कारणवश प्रारंभिक शिक्षा से दूर राखा गया था, तब संभ्रान्त परिवारों
के लोग भी लड़कियों को विद्यालय नहीं भेजते थे, विद्यालय का उद्घाटन स्वामी रामकृष्ण परमहंस की जीवन संगिनी माँ
शारदा ने किया जिन्होंने जीवनभर भगिनी निवेदिता को मातृवत स्नेह दिया, उसी शाला ने अभी कुछ दिन पहले अपना 125 वां
स्थापना दिवस मनाया। प्रारम्भ में जापान की ओकाकुश तथा टैगोर परिवार से संलग्न सरला घोषाल से निर्देशन तथा सहयोग
मिला।
1899 में जब पूरे भारत में प्लेग महामारी फैली थी अत्यन्त त्याग भावना से गंभीर रुग्ण बीमारों की सेवा की। स्वामी
विवेकानंद जी ने निवेदिता को भारत का गरिमामय इतिहास, तत्वज्ञान, साहित्य और सांस्कृतिक परम्पराओं से आत्मसात कर
भारतीयों के चारित्रिक आख्यायाओं तथा धारणाओं के अस्तित्व को ग्रहण करवाया, अपनी समाज सेवा की वृत्तियों के कारण
इनके संपर्क में तत्कालीन बंगाल की महान विभूतियों में गुरुदेव रविन्द्रनाथ, वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु, भारत के महान चित्रकार
नन्दलाल बोस भी आए, जिनके प्रगल्भ विचारों का भी उन पर प्रभाव रहा। उनके गुरु स्वामी विवेकानंद जी उन्हें मानस पुत्री
मानते थे, कड़े धार्मिक नियमों को मानकर वेदांत सीखा, जिसका जीवन भर पालन किया तथा 1903 में पुस्तक लिखी, “वेब
ऑफ इंडियन लाइफ”। 1910 में स्वामी विवेकानंद जी को श्रद्धांजलि देने हेतु एक पुस्तक का सृजन किया जिसका नाम “द
मास्टर एज आई सॉ हिम” था, जिसमें अपने स्वामीजी के साथ अपने अनुभव लिखे।
स्वामी जी की अन्य दो शिष्याओं जिसमें नार्वे के प्रसिद्ध संगीतकार ओले बुल की पत्नी सारा तथा अमेरिका की जोसफिन
मेकलाँड थीं जिन्होंने भारत में कश्मीर तथा अमेरिका में स्वामी जी के साथ अनेक यात्राएँ कीं। भगिनी निवेदिता ने स्वतंत्रता
आन्दोलन में देशभक्त सेनानियों की निर्भयता से मदद की। 22 जून 1897 को अमर शहीद दामोदर, बालकृष्ण और वासुदेव
चाफेकर जिन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों डब्ल्यू सी रेंड तथा उनके सैन्य अंगरक्षक लेफ्टिनेंट आयरस्ट को दिन दहाड़े गोली से
भून दिया था, परिणामस्वरूप अंग्रेज सरकार ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई। तब भगिनी निवेदिता उनकी माँ लक्ष्मीबाई
चाफेकर से मिलने पुणे गई थीं, तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि उनकी माँ ने भगिनी निवेदिता का घर के द्वार पर स्वागत किया।
इतना ही नहीं, निवेदिता के यह कहने पर कि आपकी आँखों में आँसू नहीं हैं, तब देशभक्त माँ बोली कि “मुझे दुःख है
कि मेरे अब कोई और पुत्र नहीं है जो इस भारतभूमि हेतु अपने प्राण दे।” तो निवेदिता स्वयं उनके पैरों में गिरकर रोने
लगी और कहा “आप धन्य हैं माँ।”
विवेकानंद जी ने उन पर एक कविता बनाई थी— “जगत्जननी जैसा सर्वव्यापी विराट हृदय, वीरो जैसी इच्छा शक्ति,
शीतल मंद दक्षिणी समीर जिसकी मिठास, आर्यों की यज्ञ वेदिका, यज्ञ वेदिका पर धधकती पवित्र और मुक्त ज्वाला जैसा
जादुई आकर्षण—ये सब तुम्हारे हों, और इससे भी कई अधिक, जिसकी कल्पना किसी प्राचीन आत्मा ने पहले कभी नहीं
की थी। तुम भारत के भावी पुत्रों के लिए स्वामिनी, सेविका और मित्र बनो।”
2 जुलाई 1902 को बेल्लूर में अपने गुरु के अंतिम दर्शन हुए और उनके निधन पर वे अपने आप को नहीं रोक पाईं और
एक बच्चे की तरह रोईं।
दुर्गापूजा की छुट्टियों में दार्जिलिंग गईं जहाँ 13 अक्टूबर 1911 को देशभक्ति और आध्यात्मिकता से परिपूर्ण इस महान संत
का निधन हो गया। उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए कोलकाता और हावड़ा को जोड़ने वाले सेतु का नाम “निवेदिता
सेतु” रखा गया है। भारत सरकार ने सिस्टर निवेदिता के भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में
अमूल्य योगदान हेतु उन्हें विभिन्न रूपों से सम्मानित किया है। उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया तथा उनकी
150वीं जयंती पर उनके नाम से (ICSSR) शोध फेलोशिप स्थापित की है। उनका कहना था कि भारत में सर्वप्रथम जिस कार्य
की आवश्यकता है वह है अपने इतिहास को पुनः लिखना।
उनके आदर्शों को भारतीय शिक्षा प्रणाली ने आत्मसात कर उनके निर्देशित नियमों को वर्तमान शिक्षा प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग
बनाया, जिसमें प्रमुख हैं—
- चित्त की वृत्तियों का योग द्वारा विरोध
- केंद्रीयकरण विधि द्वारा मन का विकास
- धनात्मक विचार, चरित्र निर्माण, देशभक्ति तथा इच्छा शक्ति आदि गुणों का विकास
- व्यक्ति के अवलोकन की क्षमता का विकास
- राष्ट्रसेवा का उद्देश्य, मानव प्रेम, समाज सेवा तथा विश्व बंधुत्व जैसे गुणों का विकास
- छात्र का समग्र विकास जिसमें शारीरिक, मानसिक, धार्मिक, नैतिक, भावात्मक तथा व्यावसायिक अनुभूति का विकास भी
शामिल हो
सम्पूर्ण भारत उनकी देशसेवा, आध्यात्मिक मार्गदर्शन, समग्र शिक्षा क्षेत्र में उनके योगदान हेतु हमेशा ऋणी रहेगा।
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