“ठण्ड नहीं बदलती, पर ठण्ड में समाज का असली तापमान सामने आ जाता है।”
यशवन्त कोठारी, जयपुर
ये ठण्ड के दिन। ठण्डे, उदास और बासी दिन। इन दिनों सूरज भी अफसर हो जाता है। सुबह देर से आता है और शाम को जल्दी
चला जाता है। बादल, हवा, वर्षा, शीत लहर सब एक के बाद एक आते चले जाते है।
सर्दी अमीरों की और गर्मी गरीबों की। सर्दी में ओढ़ना, बिछाना भी एक समस्या। खाने-पीने के मजे भी केवल अमीरों के। सरदी के दिन। कब कौन चला जाये कुछ कहा नहीं जा सकता।
ठण्ड के दिन। ताव के दिन। सूरज और धूप को तलाशने के दिन। दिन सरकता है और दिल दरकता है। बड़े-बूढ़े सूरज की धूप के साथ सरकते रहते है। धीरे-धीरे जिन्दगी धूप के बावजूद, ठण्डी, बेजान और बेस्वाद हो जाती है।
सर्दी में अमीर को बदाम, काजू, किसमिश, पिस्ते आदि याद आते है। गरीब को मूंगफली, तिल्ली की याद आती है। सर्दी में लौंग, इलायची, अदरक, सौंठ, पिपल, कालीमिर्च तथा तुलसी के पत्ताों से बनी चाय भी बहुत याद आती है।
सर्दी में रजाई और कम्बल की याद भी सताती है। मेरे पितामह के पास सर्दी का बड़ा अच्छा इलाज था वे कहते थे ठण्ड-ठण्ड क्या करते हो, ठण्ड क्या तुमको खाती है, लक्कड़ होकर सो जाओ तो ऊपर होकर जाती है।
सर्दी के दिनों में ही हजारों तरह के फूल खिलते है और नव- विवाहित जोड़े ठण्ड के दिनों में हनीमून को याद करते हैं। बच्चे पतंगों के नाम पर छत पर उछल-कूद करते है।
प्रौढ़ ठण्ड में तेल मालिश के बाद धूप स्नान करते है। प्रौढ़ाएं सर में तेल लगाकर मालिश करती देखी जा सकती है। मालिश का राजनीति में भी बड़ा महत्व है।
सर्दी के दिनों में इधर राजनीति में बड़ी गर्मी है। असंतुष्टों का तापमान निरन्तर बढ़ता रहता है तथा विपक्षी दल सरकार के कार्यक्रमों की हवा निकालता रहता है। सर्दी के दिनों में जातिवाद, सम्प्रदायवाद ऊपर आ जाता है।
सर्दी में मनुष्य क्या करे और क्या ना करें ‘टू भी और नोट टू भी’ के मकड़जाल में फंस जाता है। बूढ़ो, जवानों, गरीबों, अमीरों, प्रेमियों, प्रेमिकाओं, नवविवाहिताओं सब के लिए सर्दी कुछ न कुछ लेकर आती है।
सर्दी है तो ऊनी कपड़े भी अच्छे लगते है। सेल में मिलने वाले स्वेटर, जर्सी और कोट, मफलर, जॉकेट, शाल, कार्डिगन आदि
बहुत याद आते है।
ठण्ड के दिनों में ही सरकार रेन बसेरे बनाती है और कम्बल मुफ्त बटवाती है। इस कार्य में जो कमीशन मिलता है उससे
अफसरों तथा नेताओं की ढण्ड उड़ती है।
व्यापारी वर्ग अपनी ठण्ड उड़ाने के लिए वस्तुओं के दाम बढ़ा देते है। ठण्ड है तो चाय, कॉफी तथा गर्म पेय पदार्थों से जीवन को चलाना पड़ता है।
यही दिन है जब पीने वालों की मौज हो जाती है। नोनवेज का संसार भी इन्हीं दिनों गुलजार होता है। ठण्ड के दिनों में कुत्ता भी हलवाई के आसपास बैठा रहता है।
ठण्ड के दिनों यदि नया कोट नहीं बनवा सकते हो तो क्या हुआ। पुराना ओवरकोट पहनकर ठण्ड से लड़ा जा सकता है। औसत व्यंग्यकार ठण्ड के दिनों में व्यंग्य लिखकर अपना गुजारा कर सकता है।
ठण्ड है तो कलम भी धीरे-धीरे ठण्डी-ठण्डी चलती है और सब कुछ शीत लहर सा लगता है। पहाड़ों पर बर्फ गिरती है तो मैदानांें
में आदमी शी-शी करने लग जाता है।
ठण्ड से बचना संभव नहीं है। ठण्ड को तो जीना पड़ता है। जीवन है तो ठण्ड भी है।
ज्यादातर बड़े-बुजुर्ग ठण्ड के दिनों में ठण्ड नहीं झेल पाते और स्वर्गीय र्स्र्गीय हो जाते है लेकिन मृत्यु तो शाश्वत सत्य है और ठण्ड भी शाश्वत है।