“साहित्य का मंच, ठगों का तंत्र—सावधान, साइबर व्यंग्य का प्रहार!”
यशवंत कोठारी, जयपुर
सारांश:
यह व्यंग्य साहित्य जगत में सक्रिय उन साइबर ठगों की पोल खोलता है जो तकनीक और जालसाजी से मंच, सम्मान और अवसर हथिया लेते हैं। लेखक ने मज़ेदार लेकिन तीखे अंदाज़ में उन घटनाओं को पेश किया है जहाँ असली साहित्यकार दर-ब-दर भटकते हैं और छद्म विद्वान दावतें उड़ाते हैं। व्यंग्य चेतावनी देता है कि साहित्य भी अब साइबर ठगी से सुरक्षित नहीं—जहाँ पुरस्कार भी सौदेबाज़ी का हिस्सा बन चुके हैं। पर कैसे ?आइए, जानें यह दिल खुश का देने वाली हास्य रचना को पढ़कर —
चलिए आज साहित्य के साइबर ठगों की चर्चा करते हैं .ये लोग अपने अपने ड्रोन से साहित्य के आकाश की निगरानी करते रहते हैं ,एआइ की मदद से अपने अपने कबूतर उड़ाते रहते हैं ,जहाँ कहीं भी कोई कार्यक्रम होने की खबर आती है ये साइबर ठग अपना काम शुरू कर देते हैं .आपस में एक दू सरे को जानकारी देते रहते हैं जरूरत पड़ने पर विरोधी खेमे के आमंत्रण हथिया लेते हैं एक बार तो मेरा फ्लाइट का टिकट जो आयोजकों ने बनवाया था केंसिल करा स्वयं पहुच गए फिर किराये के लिए आयोजकों के सामने गिडगिडाते रहे .आयोजकों को दया आई उन्हें ट्रेन से वापस भेज दिया .
पिछले दिनों राजधानी में ऐसा ही एक जलसा हुआ मानदेय वाले नहीं पहुचें, मुफ्तियें साइबर ठग पहुच गए. कईयों ने एक दूसरे को खबर कर दी साहित्य के भंडारे का हलुआ खाने गिद्ध तक पहुँच गए .
भंडारे के बाद तृप्ति की लम्बी डकार लेने के बाद के कुछ सिनेरिओ पेश –ए-खिदमत है .
एक साइबर ठग बोला –अकादमी से जुड़े रहना एक कला है सब को साधना पड़ता है ,हर किसी के बस का नहीं है अकादमी सचिव, अध्यक्ष ,भाषा के संयोजक सब को संभालना पड़ता है ,यहाँ राजधानी में रह कर यह सब कर लेता हूँ ,कार्यक्रम किसी भी भाषा का हो मुझे मंच मिल जाता है पुराना अनुभव काम आता है .
दूसरे ने एक लम्बी डकार मारी और उवाचे –
मेरा तो सीधा सिद्धांत है इस हाथ दो उस हाथ लो .सचिव को किसी न किसी प्रोग्राम में फ्लाइट का किराया पञ्च स्तरीय सुविधाएँ दिलाता हूँ अपनी पेम्फलेट रुपी पत्रिका में मुखपृष्ठ पर उनका फोटो छापता हूँ ,कभी शबाब की भी व्यवस्था कर देता हूँ और वे मुझे बुला लेते हैं .
जिनको जेल में होना चाहिए वे मंच की शोभा बढा रहे थे ,साइबर ठग मज़े मार रहे थे .असली लोग कोर्ट के चक्कर लगा रहे थे .ये ठग आप से ही खाता नंबर मांगेगे ओटीपी लेंगे और आप का ही साहित्यिक खाता साफ करने में लग जायेंगे . बचना भाई साहित्य के साइबर ठग आप तक पहुँचने वाले हैं ,फिर न कहना खबर ना हुईं .
साइबर ठग रोज़ नए नए पैतरें काम में लेते हैं एक ने सौ लेखकों की सूचि जारी की दूसरे ने दूसरी सूची जारी की सब में नाम गलत .कुछ ने स्वर्गीय को भी सूची में डाल दिया कुछ ने अपने चहेतों के नामों से सूची को भर दिया ,साइबर ठग कवि को कहानीकार व्यंग्यकार को नाटककार कुछ भी बना सकते हैं ,यदि आप अकादमी के सदस्य है तो आप को कही न कहीं फिट कर देंगे .वे मुक्तिबोध या निराला को याद नहीं करेंगे अपने आकाओं को याद करेंगे उनकी चिलम भरेंगे .ये ठग एक शाल रुपी अंगोछे व द्रवित डिनर के लिए किसी का भी गला काट कर अपने आका की झोली में डालने को हमेशा तैयार रहते हैं .
कल एक साइबर ठग का फोन आया –कुशल क्षेम के बाद बोले-
किसी भी भाषा का अकादमी पुरस्कार लेना हो तो बोलो ,दिला दूंगा.
मैंने पूछा क्या खर्चा आएगा ?
-प्रमाण पत्र और मोमेन्टो आप का राशी हमारी. हम आपस में देख लेंगे .
-लेकिन मेरी तो कोई किताब ही नहीं है ,
-किताब का क्या है हम लिख कर छपवा देंगे .पैसा आपका लगेगा !
यार यह तो महंगा सौदा है ,आधा -आधा कर लेते हैं मैंने ने कहा , वे नहीं माने पुरस्कार मेरे हाथ से निकल गया, इधर सचिव योन शोषण में फंस गए अभी पेंशन को भटकेंगे ,ऐसा सयानों का कहना है.
एक अन्य साइबर ठग ने काले धन को सफ़ेद करने का रॉयल्टी वाला नुस्खा बताया वो भी मेरे को नहीं जमा क्योकि वैसे नुस्खे आयकर वाले पकड़ लेते हैं .ठगों की कोई कमी नहीं है एक ढूँढो हज़ार मिलते है .ये किसी भी लेखक को डिजिटल अरेस्ट कर लेते है उसे दिल्ली, पटना, जयपुर या लखनऊ में अपहरण कर किसी मंच पर एक प्रोडक्ट के रूप में पेश कर देते हैं .कविता हो या कहानी मंच से साइबर ठगों की ही आवाज़ सुनाई देती है . श्रोता ताली और माथा दोनों एक साथ पीटते हैं !
कौन साइबर ठगवा नगरिया लूटल हो !राम!!
(काल्पनिक रचना.)
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जय हो
शानदार ,धारदार ,मज़ेदार