“रंगों से बढ़कर है वो एहसास, जो यादों में हर होली को जीवित रखे…”
सुशीला तिवारी, रायबरेली (उत्तर प्रदेश)
होली आते ही न जाने क्यूँ पुरानी स्मृतियाँ अनायास ही आकर दस्तक देकर कुछ बेचैन कर देती हैं ।
होली के दिन खूब धमाकेदार रंग अबीर गुलाल लेकर सखी सहेलियों के साथ खेलना बहुत अच्छा लगता था । पर बावजूद इसके निगाहें बेसब्री से किसी और को ढूँढती रहती थी ,मन में यह पंक्तिया लगातार गुनगुनाए जा रही थी कि “बिना उसे रंग लगाये ये फागुन लौट न जाये”
पर वही होता था फागुन लौट जाता था बिना रंग लगाये ही उसे ,क्यों कि उसे शायद यह नही मालूम था ,एक तरफा प्रेम अभिसिंचन था मेरे में इजहार-ए मुहब्बत करने की शक्ति नही थी थोड़ा डरपोक, शर्मीला स्वभाव था ।
उसे क्या मालूम था कि उससे कोई टूटकर बेइंतिहा मुहब्बत करता है ,और उसका कोई इतनी शिद्दत से इन्तजार कर रहा है , वह अपनी दुनिया में व्यस्त होता था।
मैं बावरी सी हर साल मूक होकर बस इन्तजार और इन्तजार करते- करते अपनी दुनिया में व्यस्त हो गई ,पर वह प्रेम जो निस्वार्थ भाव से किया गया था ।
वह हटने का नाम नही ले रहा था ।
हृदय पटल पर हमेशा के लिए अंकित होकर दबकर रह गया ।
होली आते ही दिल में तूफान सा आ जाता है ,और यादें बवंडर बन कर धीरे से शान्त हो जाती है ।
उसके नाम से थोड़ा सा गुलाल लेकर आकाश की तरफ मुस्कुराहट के साथ उड़ा देती हूँ ,हर साल आत्मविश्वास के साथ सन्तुष्टि हो जाती है ।
किसी को पा लेना ही प्रेम नही,अपितु बिछड़ के भी प्रेम बना रहे ।
उम्र की ढलती सांझ में एक बार मिला होली में मैने गुलाल लगा कर कहा ये प्रेम का रंग है संभाल कर रखना ।
एक उम्र गुजर गई गुलाल लगाने के लिए ,,,
और सारे गिले शिकवे पल भर में सुनाकर कहा ,,,,,,
“वक्त करता जो वफा आप हमारे होते”
शायद वह होली यादगार बन गई!