रंगों का मौसम है, पर दिल अब भी तेरे इंतज़ार में है…
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शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
साजन (गीत)
कुछ ज़्यादा ही खो गई साजन तेरे प्यार में,
कुछ तो असर हुआ ही है फागुन की बयार में।
सास–ससुर, देवर–ननद से घर भरा है पूरा,
पर साजन परदेस गए, जीवन लगे अधूरा।
उन बिन आग लगी है मेरे चैन और करार में,
कुछ तो असर हुआ ही है फागुन की बहार में।
होली भी नज़दीक आ गई, सजना किए हैं फोन,
न जाने किस दिन आएँगे, जानूँ न दिन कौन।
उनके बिना ऐसा लगता, कोई नहीं संसार में,
कुछ तो असर हुआ ही है फागुन की बहार में।
सबसे पहले मुझको रंगते काला, पीला, लाल,
ताकि कोई दूजा न रंगे मेरे गोरे गाल।
होली के रंग में रंग दो मोहे, लगा दो गुलाल,
प्यार बहुत आता है शबनम, उनसे हर तकरार में।
कुछ तो असर हुआ ही है फागुन की बयार में।
होली (ग़ज़ल)
मन की दशा बताऊँ कैसे, मन में ढेरों उलझन है,
तेरी एक झलक जो देखी, बढ़ गई मेरी धड़कन है।
सिहर-सिहर उठती है काया भोर उषा की बेला में,
सुबह-सुबह हृदय को कपाए ठंडी कैसी पवन है।
देवर छुपकर खड़ा हुआ है, हाथों ले रंग गुलाल,
बस रंगों में सराबोर कर कहे — “भाभी, फागुन है!”
मेरी कविता की पंक्ति-पंक्ति, अर्थों में तुम पाओगे,
गीत, ग़ज़ल और शेर-रुबाई — तेरा ही वर्णन है।
बीच चौराहे छोड़ गए तुम आगे बढ़ते-निकलते,
तेरे इंतज़ार में शबनम की ठहरी हर नयन है।
महँगाई की मार (कविता )
महँगाई ने इतना मारा, हो गई सबकी बेरंग होली,
रास नहीं आता अब कुछ, होली की हँसी-ठिठोली।
केवल शिष्टाचार बचा है, जिसे हम दोहराते हैं,
पहले रंगों में सराबोर थे, अब बस अबीर लगाते हैं।
होली की हुड़दंग छुप गई, क्योंकि खाली है झोली,
रास नहीं आता अब कुछ, होली की हँसी-ठिठोली।
खरी-खरी मैं कहती हूँ, चाहे लगे बुरा या अच्छा,
मुझको फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कथन है सच्चा।
शब्दों की बंदूक चलाती, वाक्यों से मारूँ गोली,
रास नहीं आता अब कुछ, होली की हँसी-ठिठोली।
टेसू के फूल (कविता )
कुदरत का देखिए कैसा उसूल है,
डालियों में पत्ते नहीं, बस फूल ही फूल हैं।
रासायनिक रंगों का अब बढ़ता चलन हुआ,
टेसू का रंग जैसे अब नहीं कबूल हुआ।
त्योहार भी अब केवल शिष्टाचार होने लगा,
कीचड़ और मिट्टी की वो धूल कहाँ खो गया?
दिल में डर पाले हो, अपनी ही दुश्मनी,
होली का त्योहार नहीं — ये तेरी ही भूल है।
शबनम नहीं दिखावा करती अपने प्यार में,
उसके लिए कुर्बान है जीवन समूल है।