ग़ज़लों का रंग” –“हर लफ़्ज़ में मोहब्बत, हर एहसास में एक अधूरी कहानी…”
✍️ शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
ग़ज़ल 1
जल्द ही एक काम कर दूँगी,
ज़िन्दगी तेरे नाम कर दूँगी।
राज़-ए-दिल मैं तुम्हारे एक दिन,
ज़रूर सरे-आम कर दूँगी।
मंज़िल तलाशते हो मुझमें तुम,
नाम तेरा मुकाम कर दूँगी।
तुम्हारी सारी उदासियाँ समेटे,
खुशनुमा शाम कर दूँगी।
मैंने शबनम ये कसम खाई है,
आपके साथ हर गाम कर दूँगी।
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ग़ज़ल 2
लुट गए सारे कुछ मोहब्बत में,
हम तो मसरूफ़ थे इबादत में।
ये नहीं जानती हर ख़्वाब पूरा होगा,
फ़र्क है ख़्वाब और हक़ीक़त में।
वक़्त कम है क्यों न हँस कर जी लें,
काट लें ज़िन्दगी अब शरारत में।
मैं यक़ीन उस पे कर नहीं सकती,
वो खड़ा मेरी ही हिफ़ाज़त में।
वो सब जान गया है “शबनम”,
ये हक़ीक़त और बनावट में।
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ग़ज़ल 3
मुझ पर भी अपनी नज़रें इनायत किया करो,
कुछ और ज़्यादा मुझसे मोहब्बत किया करो।
अब इश्क़-मोहब्बत की बहुत बात कर लिए,
दिल की बात पूरी वो मेहनत किया करो।
हर चीज़ चाह लेने से मुकम्मल नहीं मिलती,
मिल जाए उसी चीज़ की हसरत किया करो।
हर शेर में कुछ बात हो ये सोच कर कहना,
शेरो-शायरी में कुछ ना उजालत किया करो।
शबनम से माँगना अगर पड़े तो शौक से माँगो,
लेकिन लफ़्ज़-जुमलों से ख़िदमत किया करो।
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ग़ज़ल 4
सारे ख़त जो लिखे थे जला दीजिए,
मेरी यादों को दिल से मिटा दीजिए।
मैं चला आपकी इस गली छोड़कर,
आप भी अब मुझको भुला दीजिए।
जानता हूँ इस सज़ा के हूँ मैं क़ाबिल,
मेरे दिल पे कुछ ठोकर लगा दीजिए।
हूँ मैं हक़दार मिलती है जो भी सजाएँ,
मुन्तज़िर हूँ बस मुझको सज़ा दीजिए।
हो सज़ा गर मुक़र्रर “शबनम” मुझे,
भूल क्या हो गई है बता दीजिए।
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ग़ज़ल 5
तुम भी मुझसे ही करो प्यार ज़रूरी तो नहीं,
एक फ़क़त हम रहें दिलदार ज़रूरी तो नहीं।
तुम तो सुंदर सी कली हो सारी बगिया की,
एक मधुकर ही हो हक़दार ज़रूरी तो नहीं।
हमने तो प्यार का इज़हार किया है लेकिन,
तुम भी कर लो इसे इकरार ज़रूरी तो नहीं।
हमने तो कर दिया निसार तुम पर सब अपना,
प्यार का तुम करो इज़हार ज़रूरी तो नहीं।
हम तो बर्बाद हुए इश्क़ में तेरे “शबनम”,
देखो तुम बर्बाद करो चैनो-करार ज़रूरी तो नहीं।
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ग़ज़ल 6
होगा लंबा ये सफ़र, चल सको तो चलो,
मिलेंगे राह में पत्थर, चल सको तो चलो।
उड़ान पूरी हो जाएगी अगर तुम्हारी,
फिर मिलेंगे शम्सो-क़मर, चल सको तो चलो।
कारवाँ लूटने का भय रहता है इन राहों में,
मिले कब बुरी ख़बर, चल सको तो चलो।
मचल जाते हो राह की रंगीनियों में तुम,
चलेंगे हम तो दीगर, चल सको तो चलो।
उनकी ख़ामोशी पर एक दिन “शबनम”,
मचेगा देखना ग़दर, चल सको तो चलो।
One Comment
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शबनम साहिबा की गजलें हमेशां ही बेहतरीन भाव लिए हुए होती हैं. शुभकामनाएं आदरनीया के लिए.