शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
सलामत रहे
चाहे दिल टूटे चाहे बहुत दर्द हो,
प्यार का तेरे मरहम सलामत रहे
उम्र भर चाहे रोती रहूँ दर्द हो,
तेरी ख़ुशियाँ ए हमदम सलामत रहे
जानती हूँ गजल गाने का
शौक़ मन में हैं तेरा बहुत ,
आखरी हिचकी मेरी आने लगे
तेरे होंठों पे सरगम सलामत रहे
ज़िन्दगी तेरी गुजरी रईसी में पर
मैंने फाकाकशी का किया सामना
मेरी फाकाकशी न तुम ग़म करो
तेरे सारे वो दिरहम सलामत रहे
मानती हूँ तुम्हें जानती हूँ तुम्हें
सच कहूँ दिल से पहचानती तुम्हें
मेरी आँचल जले तो जले ये मगर
तेरा लहराता परचम सलामत रहे
शब्ज़ पत्तों पे मैं तो दिखती हूँ बस
धूप उगती तो झट सूखती हूँ मैं ,
प्यार से भी अगर तुम न देखो मुझे
कैसे तेरी ये शबनम सलामत रहे ।
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अपना
न हुआ अपनों का अपना हमारा हो नही सकता
जिसे एक बार त्यागा है वो प्यारा हो नही सकता
भले ही सीना छलनी हो गया रण क्षेत्र में जिसका
नही जिसने दिखाई पीठ रण हारा हो नही सकता
तेरी गद्दारी का ऐ दोस्त मैं तो मुक्तभोगी हूँ
कभी तुम साहबे मसनद दुबारा हो नही सकता
तुम्हारे पूर्व के ये कृत्य ही संदेश देते हैं
किसी का जिंदगी भर तुम सहारा हो नही सकता
हमारे प्यार को ठुकराके तुमने गैर को थामा
कभी अब इश्क तुमसे भी दुबारा हो नही सकता
वो शबनम गिर गए एक बार जब की मेरी नजरों से
हमारी आँख का फिर से वो तारा हो नही सकता
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इबादत
ज़िस्म नहीं मेरी रूह को भी छू सको तो इश्क़ करो
वसन उतारना,मुहब्बत नहीं आन का मान रखो तो इश्क करो
हज़ारों की भीड़ में हक़ से हाथ थाम सको तो इश्क़ करो
वो मेरी है नहीं मैं उसका हूँ ऐसा कह सको तो इश्क़ करो
मेरे साथ मेरे बाद भी मेरी यादों में सँवर सको तो इश्क़ करो
मुझे खोकर भी मुझे बेवफा नहीं थी कह सको तो इश्क़ करो
One Comment
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Interesting take on love!