“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
दौलत-ओ-शोहरत का खुमार उतरा जब आँखों से,तब जाना कि बुलंदी से पस्ती पे आना क्या होता है..
सुकून की तलाश
नर्म मुलायम गद्देदार बिस्तर पर लेटे हुए नींद की देवी का इंतज़ार करते हुए आज वो मिट्टी के फर्श पर बिछी जूट की चटाई बहुत याद आई। खेलकूद कर या दिन भर काम करके जब आकर उस चटाई पर लेटता था तो नींद का इंतज़ार करना ही नहीं पड़ता था, वो झट से पलकों पर आ बैठती और उसके भार से पलकें कब बंद हो जाती थीं पता ही नहीं चलता था। लेकिन अब सारी सुख सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी नींद की खुशामदें करनी पड़ती हैं, मान मनोहार करना पड़ता है, तब जाकर उसको तरस आता है और वो घंटे दो घंटे के लिए हम पर मेहरबान होती है।
इंसान को किसी सूरत सुकून मयस्सर नहीं होता, चाहे वो अमीर हो या ग़रीब। ग़रीब है तो दाने-दाने के लिए जद्दोजहद करता है और सुख सुविधाएं पाने के लिए एड़ियां घिसता रहता है। और अगर अमीर है, सारी नेमतें मयस्सर हैं, हर सुख सुविधा मौजूद हैं तब भी छोटी-छोटी चीज़ों के लिए बेकरार रहता है। हालांकि ज़्यादातर अमीर इंसान इसलिए बेकरार रहते हैं कि, जो कामयाबी उसने पाई होती है वो यूंही तो मिली नहीं होती। उसके लिए कीमतें अदा करनी पड़ती है। और जो कीमतें चुकाई जाती हैं उसके बदले में थोड़ी बेकरारी, बेचैनी मिलना तो लाज़मी है।
ग़रीबी से अमीरी तक के सफ़र में बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ती हैं हमें। कभी एहसास-ओ-जज़्बातों की, कभी किसी रिश्ते की तो कभी-कभी हमें अपने किसी अज़ीज़ हस्ती की कुर्बानी भी देनी पड़ जाती है।
बशीर खान नींद न आने की वजह से बेतहाशा झुंझलाया हुआ था। करवटें बदल-बदलकर वह थक गया तो उठकर अपने आलिशान महल की खिड़की में जा खड़ा हुआ। ठंडी हवा के झोंके ने उसके तपते वजूद को राहत दी। चाँद आसमान में अपने पूरे आब-ओ-ताब से चाँदनी बिखेर रहा था, उसकी दूधिया चाँदनी में सारा शहर नहाया हुआ मालूम पड़ रहा था…
न जाने कितनी देर तक बशीर खान खिड़की में खड़ा बाहर देखता रहा। शायद रात का आख़िरी पहर था जब उसे नींद ने आहिस्ता से छुआ। वो खिड़की से हटकर बेड पर जाकर गिर गया। उसकी पलकें बंद हुईं और दिमाग़ गूनूदगी में जा रहा था कि तभी अज़ान की आवाज़ उसके कानों में गूंजी, लेकिन उस समय भी वो चूक गया और नींद ने पूरी तरह से उसे अपनी आगोश में ले लिया था।
कभी-कभी इंसान के हाथ इस क़दर बुराई के दलदल में धंस जाते हैं कि फिर ना तो कोई दुआ काम आती है ना ही नेकियां हाथ थामने आती हैं। ऐसा लगता है ख़ुदा उससे इबादत का हक़ भी छीन लेता है।
बशीर खान की ज़िंदगी का सफ़र भी बहुत कठिन और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तय हुआ था। अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए उसे सही-ग़लत जो भी रास्ता दिखा बस वो चलता रहा। क्या होगा, क्या नहीं—कुछ नहीं सोचा। और आज देश के बड़े-बड़े प्रतिष्ठित सियासतदानों में बशीर खान का नाम दर्ज़ था तो यह नाम, यह मकाम पाने के लिए उसने अपना आप तक गवां दिया था, अपने वजूद को भूल गया था वो।
और उसका यह सफ़र उसी दिन शुरू हो गया था जब इलाज़ के अभाव में उसकी माँ की मौत हो गई थी। बशीर ने उसी समय ठान लिया था कि भले वो पैदा ग़रीब हुआ है मगर ग़रीब मरेगा नहीं…
(क्रमश:)
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