“कामयाबी वही, जो इंसान को ऊँचा उठाए—उसका ज़मीर न गिराए।”
आश हम्द, पटना( बिहार)
एक भाई का सपना
बशीर खान जब महज़ बारह साल का था तभी उसके सिर से माँ-बाप दोनों का साया उठ गया था। साथ में दो बहनों की ज़िम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई। घर में तंगी ऐसी थी कि दो वक़्त का खाना भी मुश्किल से जुटा पाते थे। लेकिन बशीर ने हिम्मत की और गाँव के साहुकार से थोड़ी सी ज़मीनें किराए पर लेकर उसी से अपना और अपनी दोनों बहनों का गुज़ारा करने लगा।
लेकिन समय के साथ-साथ ज़रूरतें भी बढ़ने लगी थीं। क्योंकि बहनें बड़ी हो रही थीं और दोनों कॉलेज में पहुँच गई थीं, अब उनका भी खर्च बढ़ रहा था मगर कमाई का कोई ज़रिया नज़र नहीं आ रहा था। बशीर ख़ुद तो दसवीं तक ही मुश्किल से पढ़ पाया था लेकिन वो अपनी बहनों को ख़ूब पढ़ाना चाहता था। उन्हें आत्मनिर्भर बनाना चाहता था और उसके लिए पहले उसे ख़ुद को खड़ा करना था, मगर वो समझ नहीं पा रहा था कि वह करे तो क्या करे….
उन्हीं दिनों जब वो हताश सा हो रहा था, अपनी ग़रीबी से, अपनी मुश्किलों से लड़ते-लड़ते थकने लगा था। एक दिन वो शाम को खेत से घर जा रहा था कि रास्ते में दो-चार लोगों को बैठे चाय पीते हुए देखा तो वो भी रुक गया। आज उसके सिर में बहुत दर्द हो रहा था तो उसने सोचा आज यहीं चाय पी लेता हूँ वर्ना बहनें परेशान हो जाएंगी।
यही सोचकर वह उन लोगों के साथ ही चाय पीने बैठ गया। उस दिन वहाँ दो घंटे कैसे बीत गए बशीर को पता ही नहीं चला। जब वो घर पहुँचा तो दोनों बहनें बेहद परेशान सी दरवाज़े पर खड़ी मिलीं।
“अरे! तुम बाहर क्या कर रही हो?”
“भाईजान! आप कहाँ रह गए थे आप? हम तो अभी खेतों पर जाने वाले थे आपको ढूँढने।”
जमीला ने उसका हाथ थामते हुए कहा।
“अरे मेरी प्यारी बहन, मैं कहाँ जाऊंगा! जहाँ भी जाऊंगा तुम दोनों के पास ही आऊंगा न!”
बशीर दोनों बहनों को साथ लगाए घर में दाख़िल हुआ।
“भाई, आप हाथ-मुँह धो लीजिए मैं चाय लाती हूँ।”
छोटी बहन सकीना ने किचन में जाते हुए कहा। फिर उस दिन तो सबने हँसी-खुशी खाना खाया और अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।
दूसरे दिन शाम को बशीर घर जा रहा था कि तभी कल वाले लड़कों ने उसको हाथ से इशारा करके बुलाया। बशीर को नज़रअंदाज़ करके निकलना ठीक नहीं लगा इसलिए चला गया उनके पास। उस दिन गया तो फिर रोज़ ही उनके साथ बैठने लगा।
बुराई में बहुत लज्जत होती है, वो चारों तरफ़ से इंसान को अपनी ओर खींचती है और फिर उसे ख़ुद में गुम कर लेती है। उस चाय की टपरी पर महज़ चाय ही नहीं पी जाती थी बल्कि वहाँ सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा, पान मसाला सब चलता रहता था।
बशीर भी अब चाय के साथ-साथ कभी-कभी ग़म ग़लत करने के लिए सिगरेट पीने लगा था। पहले एक-दो कश शौक़िया लगाने वाले बशीर को सिगरेट ने धीरे-धीरे अपना आदी बना लिया था। यह थोड़ी बहुत बुराइयां उसमें आ गई थीं लेकिन उसका जोश-ओ-जुनून अभी भी बरक़रार था। वो वहाँ बैठा हरदम यही सारी बातें करता रहता था और बाकियों को भी प्रोत्साहित करता रहता था।
एक दिन वो शाम को वहीं सबके साथ बैठा चाय पी रहा था कि तभी एक आदमी आकर उसके पास खड़ा हो गया।
“सलाम बशीर भाई, कैसे हो आप?”
(क्रमश:)
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