“जब संदेह सच बन बैठता है, तब समय ही सबसे बड़ा गवाह बनता है।”
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प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
…सच से उठा परदा
ग्रेनेड कमरे के बीचों-बीच गिरा और उसकी लाल बत्ती लगातार टिमटिमा रही थी।
“सब नीचे लेट जाओ!”
विनोद की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
उसने बिना एक पल गँवाए ग्रेनेड उठाया और पूरी ताकत से टूटी हुई खिड़की से बाहर फेंक दिया।
अगले ही क्षण…
धड़ाऽऽऽम…!
पूरा मोहल्ला धमाके से काँप उठा।
खिड़कियों के शीशे टूट गए।
बाहर तैनात पुलिसकर्मी तुरंत मोर्चा संभाल चुके थे।
विनोद बिजली की गति से बाहर दौड़ा।
सड़क के मोड़ पर वही काली एसयूवी तेज़ी से भाग रही थी।
उसने पिस्तौल निकाली, लेकिन गोली नहीं चलाई।
“नहीं…”
वह बुदबुदाया।
“आज नहीं… आज मुझे इनके सरगना तक पहुँचना है।”
पहली बार सामने आया सच
घर के भीतर लौटकर विनोद ने आदित्य, अनामिका और इंस्पेक्टर राजेश को बैठक में बुलाया।
उसने जेब से अपना आधिकारिक पहचान-पत्र निकाला।
उस पर भारत सरकार का चिन्ह बना था।
नीचे लिखा था—
विशेष अन्वेषण प्रकोष्ठ (Special Investigation Division)
राजेश चौंक पड़े।
“तो… आप वास्तव में कौन हैं?”
विनोद शांत स्वर में बोला—
“मैं पिछले पंद्रह वर्षों से उन मामलों की जाँच करता हूँ जिन्हें आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया है, लेकिन जिनका सच अभी जीवित है।”
आदित्य अवाक् था।
“क्या आपको ‘प्रोजेक्ट समय’ के बारे में पता है?”
विनोद ने सिर हिलाया।
“अब समय आ गया है कि तुम सब सच्चाई जानो।”
प्रोजेक्ट समय क्या था?
करीब बीस वर्ष पहले भारत के कुछ वैज्ञानिकों ने एक अत्यंत गोपनीय डिजिटल सुरक्षा परियोजना शुरू की थी।
उसका नाम था—
‘प्रोजेक्ट समय‘।
इसका उद्देश्य कोई हथियार बनाना नहीं था।
यह ऐसी तकनीक विकसित कर रही थी जो किसी भी डिजिटल रिकॉर्ड, सरकारी दस्तावेज़ या इलेक्ट्रॉनिक प्रमाण के साथ की गई छेड़छाड़ को हमेशा के लिए पकड़ सकती थी।
अर्थात…
यदि यह तकनीक सफल हो जाती…
तो दुनिया में कोई भी व्यक्ति डिजिटल सबूतों में हेरफेर करके अपराध नहीं छिपा सकता था।
प्रोफेसर शैलेन्द्र मिश्रा…
यानी अनामिका के पिता…
उसी परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक थे।
लेकिन…
इस तकनीक पर विदेशी साइबर अपराधियों और देश के कुछ भ्रष्ट लोगों की नज़र पड़ गई।
उन्होंने फ़ाइलें चुराने की कोशिश की।
जब वे असफल रहे…
तो उन्होंने प्रोफेसर मिश्रा के पूरे परिवार को निशाना बनाया।
नंदिनी का रहस्य
“तो नंदिनी कौन थी?” आदित्य ने पूछा।
(क्रमश:)
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