“प्रेम, प्रतीक्षा और पीड़ा के सुरों में रची संवेदनाओं की ग़ज़लें और गीत”
— शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
🌺 मन का मीत
तुझे अपने मन का मीत लिखूँ, प्रियतम
तुझ पर एक मधुर गीत लिखूँ।
तुम मधुर स्वर में यह गाओ,
मैं राग बसंत का संगीत लिखूँ।
मैंने वाक्य विन्यास किया,
ऐसे कोई समझे न, पर प्रीत लिखूँ।
दो दिलों के मिलन में रोक रहा,
मैंने दुनिया की यह रीत लिखूँ।
कुछ वर्तमान का यह जीवन,
कुछ भोगे हुए अतीत लिखूँ।
तुझे हार के शबनम कैसे जीए,
इस कारण तुझको जीत लिखूँ।
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🌺 औकात
अपनी औकात का पता था मुझको,
फिर भी बताया, अच्छा किया।
मुझे मालूम था ये ख्वाब टूटेगा,
एक दिन आज फिर समझाया, अच्छा किया।
मैं निश्चिंत था कि यह सच नहीं है,
तुमने ये सच दिखाया, अच्छा किया।
टूटना था ही ये सिलसिला,
एक-दो दिन में आज बिखराया, अच्छा किया।
ऋतु बसंत तो आता-जाता है,
शबनम, आज न ही बुलाया, अच्छा किया।
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🌺 ऋतु
पाँच ऋतु तो कट जाती हैं,
कठिन एक का अंत।
रात जगूँ, अनंग जगाए,
कैसा ऋतु ये बसंत।
युग बीते, संवत्सर बीते,
बीते दिवस और पल।
लेकिन प्रिय से मिलन की,
इच्छा चलती रही अनंत।
रसिक प्रियतमा को तरसे है,
कोई हरि की चाहत, लेकिन एक-सी।
प्रेमी हो या संत।
प्रेम आकर्षण ऐसा है,
धीरज रहता दूर।
बिह्वल होकर मिलन चाहता,
अति से अति तुरंत।
शबनम, प्रीतम याद करे,
मैं भी करती याद।
मगर कहूँ मैं किस तरह,
उनके प्रेम का हंत।
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🎶बंसी
तेरी बंसी के धुन पर मैं सरगम गाती हूँ,
तुम रिझो, मैं राग बसंत में शबनम गाती हूँ।
रास रचाएँ वृंदावन में राधा, गोपी, ग्वाले संग में,
सभी अभिभूत, मगन हैं, कान्हा मस्ती के रंग में।
भाव-विह्वल हो सबकी पायल छम-छम गाती है,
तुम रिझो, अब राग बसंत में शबनम गाती है।
सुखद हवाएँ यमुना तट की, मन में अनंग जगाएँ,
जहाँ प्यार ही प्यार बरसता, केवल उमंग जगाएँ।
तेरे गुणों को मधुर स्वर में हरदम गाती है,
तुम रिझो, अब राग बसंत में शबनम गाती है।
“शबनम” बन गई योजन तेरी, मुझको पास बुलाओ,
अपनी बंसी के धुन पर तुम मुझे भी तो नाचवाओ।
तेरे रहने की खुशी में ही मैं गीत सुगम गाती हूँ,
तुम रिझो, अब राग बसंत में शबनम गाती हूँ।