“मोहब्बत, माँ-बाप और मजबूरियों के बीच फंसा एक अधूरा वजूद…”
आश हम्द, पटना (बिहार)
चंद खुशियां क्या मांग ली मैंने ज़िंदगी से,
उम्र भर का मैं उसका क़र्ज़दार हो गया…..
बेंगलुरु के मणिपाल हॉस्पिटल के वीआईपी वार्ड के एक बेड पर लेटा आदम कभी छटपटाने लगता, कभी चीखने-चिल्लाने लगता। उसकी चीख-पुकार सुनकर वार्ड बाॅय दौड़ता आया, जिसको ख़ास आदम की देखभाल करने के लिए ही हायर किया गया था।
“ क्या हुआ सर ? क्यों इतना चीख रहे हैं?” वार्ड बॉय को देखा तो आदम उससे बोला – “ शकील… तम.. तुम.. तुम आ गए ? यार मैं यहाँ पड़े-पड़े बहुत बोर हो रहा हूँ, प्लीज़ मुझे यहाँ से ले चलो !”
“ अरे सर ! आपकी तबीयत अभी ठीक नहीं है। आप जल्दी से ठीक हो जाओ फिर चलेंगे यहाँ से ।” वार्ड बॉय जिसका नाम शकील था, उसने आदम को तसल्ली देते हुए कहा – “ और आदम सर ! आप इतने बेचैन क्यों हो रहे हैं ? आज फ्राइडे है और संडे को आपके घर वाले आएंगे मिलने, अगर सब कुछ ठीक रहा तो आप उनके साथ चले जाइएगा ।”
“ घर ? किसका घर ?” आदम ने हैरान सी शक्ल बनाई.. शकील उसकी कंडीशन जानता था इसलिए आराम से बोला – “ आपका घर सर, और किसका ?”
“ नहीं.. नहीं.. वह मेरा घर नहीं है, वह..वह तो क़ैदखाना है। हाँ .. क़ैदखाना है.. वहाँ मेरा दम घुटता है मैं… मैं कभी नहीं जाऊंगा वहाँ…!” कहते हुए वो अपना सर तकिये पर पटकने लगा। उसे दौरा पड़ने लगा था, उसका सारा जिस्म कांपने लगा और साँस उखड़ने लगी। शकील ने उसे किसी तरह इंजेक्शन लगाया, कुछ लम्हें उसको थामे रखा फिर धीरे-धीरे उसका जिस्म शांत होने लगा और फिर अगले चंद मिनटों में आदम दवाई के जेरेअसर नींद की आगोश में समा चुका था।
मुनीर सुल्तान अपने माँ-बाप के पहली औलाद थे, इसलिए माँ-बाप दोनों के अजीजे-जान थे। मुनीर के वालिद जमींदार थे। घर में किसी भी चीज़ की कमी नहीं थी। लेकिन जब मुनीर के बाप और चाचा के बीच ज़मीनों का बंटवारा हुआ तो उसके चाचा ने धोखे से मुनीर के हिस्से की ज़मीनें भी अपने नाम करवा लीं। देखते-देखते सारे ऐशो-आराम ख़त्म हो गए।
एक घर के अलावा उनके पास सिर्फ़ थोड़ी सी ज़मीनें बची और वह भी ऐसी थी जो बंजर हो चुकी थीं। उन पर कुछ भी फसल उगा पाना लगभग नामुमकिन था। लेकिन घर तो चलाना था जब तक ज़िंदगी थी, और तब तक खाना भी ज़रूरी था। इसलिए मुनीर के वालिद दूसरे के खेतों में काम करने पर मज़बूर हो गये। कभी वह ख़ुद सैकड़ों लोगों से काम करवाते थे आज वह ख़ुद उन सैकड़ो में शामिल हो गए थे। मुनीर का बचपन तो बहुत ऐसो-आराम में गुज़रा, लेकिन जवानी में थोड़ी मुश्किलें आने लगी थीं। हालांकि उसके बाबा पूरी कोशिश कर रहे थे कि कोई कमी ना रहे। वो अपनी ज़मीनें बेचकर उन पैसों से मुनीर की पढ़ाई का ख़र्चा पूरी करने लगे। बाकी उसके छोटे भाई-बहन सब गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे।
मुनीर ने भी अपने बाप की मेहनत का मान रखा और बिना रिश्वत खिलाए मार्केटिंग ऑफिसर बनने में कामयाब हो गये। लेकिन नौकरी मिलते ही मुनीर ने नज़रे बदल ली, अपनी पसंद से शादी कर लिया और जहाँ पोस्टिंग थी वहीं सेटल हो गये। बस त्योहार पर एक दिन के लिए गाँव जाते वह भी तब तक जब तक माँ-बाप ज़िंदा रहे, उसके बाद तो बस नाम का ही रिश्ता रहा भाई-बहनों से। मुनीर सुल्तान अपनी दुनिया मुकम्मल करके बहुत हँसी-ख़ुशी ज़िंदगी गुजार रहे थे।
बेहद पढ़ी-लिखी ख़ूबसूरत बीवी, दो प्यारे से बच्चे थे आदम और मुनीरा। आदम बचपन से ही बहुत ज़हीन और चंचल बच्चा था। वह जितना पढ़ाई में होशियार था उतना ही खेल-कूद में भी दिलचस्पी रखता था। मुनीर, उनकी बीवी या बेटी कभी भी गाँव का नाम भी नहीं लेते थे, लेकिन आदम हमेशा गाँव जाने की ज़िद्द करता था। चचाओं से मिलने की ख़्वाहिश करता, इसीलिए कभी-कभी आदम की ज़िद्द पर मुनीर को गाँव जाना पड़ जाता था।
क्रमश: