“मोहब्बत, माँ-बाप और मजबूरियों के बीच फंसा एक अधूरा वजूद…”
आश हम्द, पटना (बिहार)
…मुनीर, उनकी बीवी या बेटी कभी भी गाँव का नाम भी नहीं लेते थे, लेकिन आदम हमेशा गाँव जाने की ज़िद्द करता था। चचाओं से मिलने की ख़्वाहिश करता, इसीलिए कभी-कभी आदम की ज़िद्द पर मुनीर को गाँव जाना पड़ जाता था।
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“ चाचू, चलिए न नदी चलते हैं, आज गर्मी भी हो रही है चलिए नहाकर आते हैं !” आदम गाँव आया हुआ था और छोटे चचा से नदी जाने की ज़िद्द कर रहा था।
“ कल चलेंगे बेटा, अभी देखो शाम होने वाली है ।”
“ नहीं, बिल्कुल नहीं.. आज ही चलिए कल मुझे आपके साथ क्रिकेट खेलने जाना है !”
“ बेटा, क्रिकेट भी खेलेंगे और नदी भी चलेंगे ।” चाचा ज़फ़र ने उसे समझाने की कोशिश की।
“ नहीं चाचू, मम्मा एक बार बोलेंगी और पापा मुझे लेकर वापस चले जाएंगे ।” आदम ने बेहद उदासी से कहा। फिर ज़फ़र चचा को उसे लेकर जाना ही पड़ा। आदम ने ख़ूब मज़े किए। नदी के पानी से ख़ूब खेला, खूब नहाया और इसी वजह से रात में उसे हल्का सा बुखार हो गया। बस चचा को बहुत डांट पड़ी और सुबह होते ही मुनीर सुल्तान वापस जाने के लिए तैयार हो गए। हालांकि आदम बिल्कुल ठीक था बुखार भी बिल्कुल उतर चुका था। लेकिन मुनीर साहब की बीवी नहीं मानी। आदम बेहद उदास गाड़ी में बैठ चुका था।
ज़फ़र चचा उदास उसकी गाड़ी को दूर जाते हुए देखते रहे। आदम हसरत से खेल के मैदान को देखता हुआ रो पड़ा। “ अरे, क्या हुआ बेटा ? क्यों रो रहे हो मेरी जान ?” मुनीर सुल्तान ने उसे पुचकारा।
“ पापा, मुझे क्रिकेट खेलना था। आप क्यों मुझे ले आए ? मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक है ।”
“ बिल्कुल चुप रहो तुम ! कोई जरूरत नहीं है क्रिकेट व्रकिट खेलने की, पढ़ो-लिखो कुछ बनो, तुम भी उन गवारों की तरह बनना चाहते हो क्या ? तुम अपने जाहिल खानदान के नक्शे-कदम पर चलने की सोचना भी मत। तुम मेरे बेटे हो, रोजीना शाह के। तुम मेरी तरह बनोगे समझे तुम ? आज के बाद यहाँ आने का नाम भी मत लेना। समझे या नहीं ?” रोजीना ने तेज़ आवाज में चिल्लाकर कहा। और आदम नींद से जागकर डर से कांपने लगा।
“ हा..हाँ.. मैं समझ गया मम्मा..अब नहीं जाऊंगा..कभी नहीं जाऊंगा..!” वो सर तकिए पर पटकता हुआ बड़बड़ाता जा रहा था। शकील वहीं बैठा ऊंघ रहा था। जल्दी से उठकर उसके पास आया – “ क्या हुआ सर ! आँखें खोलिए..आदम सर..!” उसने आदम के बाजू को हिलाते हुए कहा।
पहले शकील को लगा दौरा पड़ा इसलिए जल्दी-जल्दी इंजेक्शन तैयार करने लगा, लेकिन फिर पानी का गिलास उठाया और कुछ छींटे आदम के चेहरे पर मारा और आदम हड़बड़ा कर जग गया।
“ य..यह किसने पानी फेंका मुझ पर ? हाँ बताओ मुझे ?” वह अपने कमज़ोर जिस्म को संभालता उठकर बैठने की कोशिश करने लगा, जिसमें शकील ने उसकी मदद की और तकिए का सहारा देकर उसे बैठा दिया फिर बोला – “ आपको नींद से जगाने के लिए पानी की कुछ बूँदें आपके चेहरे पर डाली थीं, क्योंकि आप नींद में बहुत बेचैन हो रहे थे। क्या हुआ सर ? कोई बुरा ख़्वाब देखा क्या ?”
“ नहीं…जाओ तुम, मैं अकेला रहना चाहता हूँ ।”
“ लेकिन सर ।” “ जाओ !” आदम गुर्राया तो वो बाहर निकल गया।
आदम ने फिर से आँखें मूंद ली। गुज़रे हुए लम्हें फिर से आँखों में तैरने लगे।
क्रमश: