जब मजबूरी ने बदली मंज़िल — एक लड़की की करुण पुकार से शुरू हुई नई क्रांति
आश हम्द, पटना
सारांश:
“मज़बूरी” कहानी है शिवानी की — एक आत्मनिर्भर, विद्रोही युवती की, जो अपने परिवार की दिखावेभरी सोच से तंग आ चुकी है। लेकिन किस्मत उसे एक ऐसी लड़की से मिलवाती है, जिसकी मदद करते हुए वह खुद एक नई दिशा पाती है। यह कहानी दिखाती है कि इंसान जब किसी और की मजबूरी को अपना मक़सद बना ले, तो ज़िंदगी सच में अर्थपूर्ण बन जाती है।आइए, अब विस्तार से पढ़ें इस प्रेरक और अनूठी कहानी के प्रथम चैप्टर को—
ट्रिन… ट्रिन..
“ येस मॉम !”
“ बेटा कहाँ हो तुम ?”
“ मैं अभी यूनिवर्सिटी से निकली हूँ, क्या हुआ ?”
मैंने गेयर बदलते हुए कहा।
“ शिवानी बेटा, आज मिस्टर जायसवाल का बेटा आकाश तुमसे मिलना चाहता है, तुम फॉरेस्टो पैराडाइज रेस्टोरेंट चली जाना वह वहाँ तुम्हारा वेट कर रहा है ।”
मम्मा की बात सुनकर मेरा माथा घूमने लगा। हर महीने दो महीने में उनको यही दौरा पड़ता है और वह किसी अमीर कबीर लड़के को लाकर मेरे सामने खड़ा कर देती हैं। और वो लड़के उनके जैसे ही पैसे के पीछे भागने वाले और अपने बाप की बनी बनाई सल्तनत पर राज करने वाले होते हैं। जिनका नाम सुनते ही मेरे गुस्से का मीटर बढ़ने लगता है। मम्मा जानती हैं कि मैं चिढ़ जाती हूँ, लेकिन वह भी अपनी आदत से मज़बूर हैं। उनको मेरी शादी करवाने का जुनून सवार हुआ रहता है। मुझे भी वह अपने जैसा बनाना चाहती हैं जिसकी कोशिश हमेशा करती हैं। लेकिन मैं भी मोटी चमड़ी हूँ उनकी एक नहीं सुनती और कुछ ना कुछ करके उनके लाए हुए रिश्ते को रिजेक्ट कर ही देती हूँ। अब आज फिर से उनका दौरा पड़ चुका है।
“ हैलो ! शिवानी, सुन रही हो ना ? मेरी आवाज आ रही है ना ?”
“ आं.. हा.. हाँ सुन रही हूँ माँ !”
“ सुन रही हो तो बोल क्यों नहीं रही ?”
“ अरे मम्मा, मैं ड्राइव कर रही हूँ, इसलिए कभी-कभी आवाज़ नहीं आती, नेटवर्क प्रॉब्लम हो जाती हैं ।”
“ अच्छा ठीक है, तो चले जाना रेस्टोरेंट ओके !”
“ ओके मॉम ।”
कहकर मैंने फोन डिसकनेक्ट कर दिया और सोचने लगी कि क्या ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ शादी करना, और बच्चे पैदा करना ही है ? क्या मुझे उस लड़के से मिलने जाना चाहिए ? वह भी तो वही होगा भाई और पापा के जैसा… बीवी बच्चे कहाँ हैं ! क्या कर रहे हैं ! कुछ नहीं पता, बस असीमित मात्रा में पैसे दे दो और हो गए सारे फ़र्ज़ पूरे। मेरे माँ-बाप दोनों एक जैसे ही हैं। इंसानों से ज्यादा पैसों को महत्व देने वाले। इसलिए उनका रिश्ता कायम है अब तक। उनका बेटा भी बिल्कुल उनके ही जैसा है, इसलिए चहीता भी है। मैं, यानी शिवानी राजवंश अपने खानदान से बिल्कुल ही डिफरेंट हूँ, तभी मेरे परिवार वाले ख़ास मुझे पसंद नहीं करते हैं।
लेकिन मैं चाहकर भी उनकी तरह बेहिस नहीं बन सकती। माॅम जल्द से जल्द मेरी शादी करवाकर उनके मुताबिक मेरी ऊल-जलूल हरकतों से छुटकारा पाना जाती हैं। लेकिन मैं भी उनकी ही बेटी हूँ, इतनी आसानी से नहीं टलूंगी। अपनी सोच पर मैं ख़ुद ही मुस्कुरा दी। तभी पता नहीं कहाँ से अचानक एक लड़की मेरी गाड़ी के आगे आ गई… मैंने जल्दी से ब्रेक लगाए थे, एक सेकंड की भी देरी उस लड़की और मेरा बहुत बड़ा नुकसान कर जाता। जैसे ही गाड़ी रुकी वो लड़की विंडो के पास आकर थपथपाने लगी –
“ द.. दी…दीदी… दीदी मेरी मदद करो…! दीदी मुझे बचा लो ! वो लोग मुझे मार डालेंगे… प्लीज दीदी मुझे बचा लो……!”
क्रमश:
One Comment
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बहुत अच्छी शुरुआत।