जहां दीप जलें, वहां मन का अंधकार मिटे — यही सच्ची दीवाली है।
सुशीला तिवारी, पश्चिम गांव, रायबरेली
सारांश:
सुशीला तिवारी की इन कविताओं में दीपावली केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक उजियारे का प्रतीक बनकर उभरती है।
हर कविता में दीपक प्रेम, ज्ञान, सौहार्द और कर्तव्य का संदेश देता है। यह संग्रह हमें याद दिलाता है कि सच्चा प्रकाश बाहर नहीं, भीतर के अंधकार को मिटाने से फैलता है।आइए, ऐसी भावपूर्ण और दिलचस्प रचनाओं का आनंद लें विस्तार से—
एक दीप देहरी पर रख देना
सारे काम नही तुम करना
बस एक काम कर लेना !
देख के रूख हवाओ का
एक दीप देहरी पर रख देना !!
कहाँ अंधेरा फैला कितना तमस कहां पर है ,
आई आज दिवाली , रात अंधेरी अमावस है ,
श्रद्धा के दीप जलाकर ,
विश्वास वर्तिका रख देना !
देख के रूख हवाओं का,
एक दीप देहरी पर रख देना !!
कितने दीप कहाँ रखना है ,किसमें कैसी बाती होगी ,
खूब समझती होगी तुम तुम्हे कला यह आती होगी !
जिम्मेदारी समझ के अपनी ,
निष्ठा से खूब निभा देना !
देख के रूख हवाओं का ,
एक दीप देहरी पर रख देना !!
हर दीपक की रक्षा करना , कभी इससे दूर नही जाना ,
कर्तब्यों की बलिवेदी पर ,बैठ के खरा उतर जाना ,
एक दीप संग अपने रखना
जीवन भर साथ निभा देना ।
देश के रूख हवाओं का ,
एक दीप देहरी पर रख देना ।।
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घर आंगन दीवाली में
चलो मिलकर सजायें ,घर आंगन दीवाली में ।
लगे घर का हर कोना बड़ा पावन दीवाली में ।।
हरे रंगत की रंगोली ,हरे ही रंग की झालर ,
लगे मास कार्तिक भी शुभे सावन दीवाली में ।
मिटा दें दम्भ को हम करें सद्भाव को कायम ,
सही उद्देश्य को समझें शुभ पूजन दीवाली में ।
आज स्वागत में सजायें दुल्हन सी अयोध्या ,
अवध में राम आयेगे मार रावन दीवाली में ।
मूर्ति गणपति की लेकर साथ लक्ष्मी जी लायें ,
मिले सुख और समृद्धि, ये आवाह्न दीवाली में ।
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कहीं बचे न अंधियारा
दीप जलायें हम सब ऐसे कहीं बचे न अंधियारा
और रोशनी ऐसी फैले,, चमक उठे ये जग सारा ।
दम्भ- द्वेष का तिमिर मिटे जो मन रोशन कर दे,
स्नेह -प्रेम का दीप जले घर आंगन हो उजियारा ।
आओ दीप जलायें हम सब,,,ज्योति पर्व मनायें ,
तिमिर भगायें दूषित मन के ,,,,,स्नेह प्रेम बरसायें
दीपक हर रोज जलाते हैं पर होती नही दीवाली,
प्रभु राम का हुआ आगमन,, खूब लगे जयकारा ।
दीवाली पर जगमग जगमग कर देना घर आंगन,
और बुराई सभी हटाकर,,,, कर लेना मन पावन ,
ज्योति संग मिट जाये सारा मन का कलुष हमारा।
और रोशनी ऐसी फैले ,,,,चमक उठे ये जग सारा ।।
प्रेम और सौहार्द बढ़ाकर,,,,,,,,करना दूर विकार,
मानवता धर्म का दीप जले हो जाए जग उजियार।
दीप जलाना तभी सार्थक मन उज्जवल हो हमारा,
और रोशनी ऐसी फैले ,,,,,,,चमक उठे ये जग सारा।
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ज्ञान का दीप जलाये
आओ ज्ञान का दीप जलायें,
दीपावली का त्योहार मनायें ।
बैर – भाव का त्याग करें हम ,
प्रेम – भाव सौहार्द निभायें ।
अंधकार मिटे अंतर्मन का ,
स्नेह , प्रेम अमृत बरसायें ।
करें उजाला ज्ञान दीप से ,
दम्भ , द्वेष सब दूर भगायें ।
कहीं अंधेरा रह न जाये ,
दया, धर्म के मोती बिखरायें ।
पूजन करें लक्ष्मी,गणेश का ,
सबका शुभ हो शीश झुकायें।
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ऐसा दीप जलाना
ऐसा दीप जलाना मन से,
मानवता का हो विस्तार।
दम्भ ,द्वेष का उन्मूलन हो,
और दिखे प्यार ही प्यार।
रहे विश्व में अमन शांति ,
खुशियों की होवे बौछार।
ज्ञान का दीप प्रेम की बाती,
आलौकित हो सारा संसार।
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सारे दीपक जला दिये
दीवाली की रात सारे दीपक जला दिये ।
थी तीरगी जो हर तरफ ,सब मिटा दिये ।।
वो शक्स हमें देखता था कातर दृष्टि से,
हमने भी उसको देखा बस मुस्कुरा दिये ।
चेहरे को खूब ढंग से ढक लिया उसने,
चिलमन जो पड़ी थी,,, हमने उठा दिये ।
अब समझ में आया जीवन है हकीकत ,
ख्वाबों के जो बनाये ,,, महल ढहा दिये ।
तेरे प्यार की निशानी कुछ नही बची है,
रक्खे थे खत सारे ,,,वो भी जला दिये ।
कल तक उनके पास, कुछ भी नही था ,
अब कह रहे हैं वो के खजाने लुटा दिये ।
सुशीला”उसने मांगी कोई निशानी दे दो ,
हमने गुलाब फेंका तो बस मुस्कुरा दिये ।