“दीप जलाएँ मन के अंधकार में — खुशहाली, शुद्धता और प्रेम के प्रकाश से।”
प्रस्तुति: शिखा तैलंग, भोपाल
सारांश :
दीपावली, भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन का पावन पर्व है जो प्रकाश, प्रेम और समृद्धि का प्रतीक है। यह केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का उत्सव भी है। पर्यावरण-संरक्षण और दान के साथ मनाई गई दीपावली ही सच्चे सुख और वैभव का संदेश देती है। आइए, व्यक्ति, समज व देश को सुख, समृद्धि तथा वैभव की ओर बढ़ने का संदेश देने वाले इस उत्सव के बारे में जानें विस्तार से—
दीपावली केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है — एक ऐसा क्षण जब अंधकार पर प्रकाश की, असत्य पर सत्य की, और निराशा पर आशा की विजय का संदेश गूँजता है। यह त्योहार “सुख, समृद्धि और वैभव” का प्रतीक है, जहाँ हर दीपक मानव हृदय में भरे प्रकाश और सकारात्मकता का द्योतक बन जाता है।
ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व
दीपावली का मूल स्वरूप रामायण काल से जुड़ा है। भगवान श्रीराम ने 14 वर्षों के वनवास के पश्चात रावण का वध कर जब अयोध्या लौटे, तब नगरवासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया। उस दिन अमावस्या की रात थी, परंतु अनगिनत दीपों की रोशनी ने अंधकार को पराजित कर दिया। यही दिन ‘दीपावली’ या ‘दीपों की पंक्ति’ कहलाया।
हिंदू धर्म के अतिरिक्त, जैन और सिख धर्मों में भी दीपावली का अपना अलग महत्व है। जैन परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान महावीर को निर्वाण की प्राप्ति हुई थी, जबकि सिख धर्म में यह दिन गुरु हरगोबिंद सिंह जी की कारावास से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार दीपावली केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी भारत की बहुधर्मी परंपरा का उत्सव है।
धन की देवी लक्ष्मी का आगमन
दीपावली की रात को मां लक्ष्मी का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से दीपावली के दिन घर और हृदय को पवित्र रखता है, मां लक्ष्मी उसके जीवन में स्थायी सुख और समृद्धि का वरदान देती हैं। घरों की सफाई, सजावट, और दीपों की रौशनी इसी भावना के प्रतीक हैं कि “जहाँ स्वच्छता और सच्चाई है, वहीं लक्ष्मी का वास है।”
भारतीय जीवन में दीपावली का महत्त्व
भारत में दीपावली केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन का उत्सव भी है। किसान अपनी फसल के कटने के बाद नया आरंभ मानते हैं। व्यापारी ‘नया लेखा-जोखा’ आरंभ करते हैं। परिवारों में आपसी प्रेम, भेंट-सौगातें और मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है। यह त्योहार संबंधों को मजबूत करता है और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को साकार करता है। यह त्योहार अब भारत के अलावा नेपाल, अमेरिका, मॉरिशस आदि देशों में निवासरत भारतीयों व कुछ अन्य समुदायों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाया जाने लगा है। यह भी मुमकिन है कि इसकी बढ़ती विश्वव्यापी लोकप्रियता को देखते हुए यूनेस्को दुनिया की ध्ररोहर के रूप में जल्द ही मान्यता दे दे। इस दिशा में भारत सरकार प्रतिबद्ध है और यदि ऐसा हुआ तो यह हम भारतीयों के लिए बेहद गर्व का विषय होगा।
अयोध्या का पुनर्जागरण और दीपों का महासागर
आज की अयोध्या फिर से दीपों के महासागर में डूबी दिखाई देती है, मानो युगों बाद श्रीराम का स्वागत पुनः हो रहा हो। लाखों दीपों से जगमगाती सरयू तट पर जब “जय श्रीराम” का उद्घोष होता है, तो लगता है जैसे भारत की आत्मा फिर से आलोकित हो उठी हो। यही है दीपावली का सच्चा संदेश — आत्मा में बसे प्रकाश को पहचानो और बाँटो।
आधुनिक संदर्भ और पर्यावरणीय जिम्मेदारी
समय के साथ दीपावली का स्वरूप बदल गया है। अब यह केवल दीपों का नहीं, बल्कि पटाखों और दिखावे का भी उत्सव बन गया है। किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वास्तविक आनंद शांति और सादगी में निहित है। पर्यावरण की रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
यहाँ कुछ सरल कदम दिए गए हैं, जो इस दीपावली को सचमुच “प्रकाशमय” बना सकते हैं:
- पर्यावरण-अनुकूल दीपावली मनाएँ — मिट्टी के दीए जलाएँ, बिजली की अंधाधुंध रोशनी से बचें।
- पटाखों का सीमित प्रयोग करें — बच्चों को ध्वनि प्रदूषण से बचाने के लिए हानिरहित पटाखों का चयन करें।
- स्वदेशी उत्पाद अपनाएँ — स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए गए दीए, सजावट और मिठाइयाँ खरीदें।
- वृक्षारोपण का संकल्प लें — हर दीपावली पर एक पौधा लगाकर धरती को भी उजाला दें।
- दान और सेवा करें — गरीबों, मजदूरों और जरूरतमंदों के साथ त्योहार की खुशियाँ साझा करें।
प्रकाश की ओर बढ़ते कदम
दीपावली हमें सिखाती है कि यदि हम अपने भीतर के अंधकार — ईर्ष्या, लोभ, द्वेष और आलस्य — को मिटा दें, तो हर दिन दीपावली बन सकता है। समाज में प्रेम, करुणा और सेवा की भावना फैलाना ही इस पर्व का असली उद्देश्य है।
आइए, इस दीपावली हम न केवल घरों में दीप जलाएँ, बल्कि अपने मन, विचारों और कर्मों में भी उजाला करें। क्योंकि जब हर हृदय में प्रकाश होगा, तभी सच्चे अर्थों में भारत “सुख, समृद्धि और वैभव का देश” कहलाएगा।