“श्रद्धा, प्रेम और जीवन की धुन – शबनम की रचनाओं में भावों का अमृत।”
शबनम मेहरोत्रा, कानपुर
सारांश:
इन रचनाओं में भक्ति, प्रेम, संबंध और आत्ममंथन की गहराई झलकती है। कभी गणेश वंदना में आशीर्वाद की याचना है, तो कभी सरगम में राधा-कृष्ण की मधुर लीला। कहीं प्रेम और विश्वास की कसक है, तो कहीं बेटी का मर्म और मन की चंचलता की सीख। आइए इन्हें पढ़ें पूरे दिल से—
गणेश वंदना
हे वक्र तुण्ड मैं तेरा , लो करती हूँ आह्वान ।
आन विराजो कलम में , लिखूँ मैं यश गान ।
मेरी लेखनी चलती जाए
उम्र न क्यों मेरी ढलती जाए
आके प्रभु बस थोड़ा देदो अपनी कृपा का दान
हे वक्र तुण्ड मैं तेरा , लो करती हूँ आह्वान
बुद्धि में तुम अति विलक्षण
तेरा करूँ मैं तिलक ओ चन्दन
देव सभी करते हैं , पहले तेरा ही गुणगान
हे वक्र तुण्ड मैं तेरा , लो करती हूँ आह्वान
मेरा बस एक काम तू करदे
नई प्रेरणा मन में भर दे
“शबनम”को दे देना प्रभुवर , अपनी कृपा का दान
हे वक्र तुण्ड मैं तेरा , लो करती हूँ आह्वान ।
आप को कोटि कोटि मेरा प्रणाम
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सरगम
तेरी बंसी के धुन पर मैं सरगम गाती हूँ
तुम रिझो मैं राग बसन्त में शबनम गाती हूँ
रास रचाये वृंदावन में
राधा गोपी ग्वाले संग में
सभी अभिभूत मगन है कान्हा
सारे ही है मस्ती के रंग में
भाव विह्वल हो सबकी पायल छम छम गाती है
तुम रिझो अब राग बसन्त में शबनम गाती है
सुखद हवाये यमुना तट की
मन मे आनंग जगाये
जहाँ प्यार ही प्यार बरसता
केवल उमंग जगाये
तेरे गुणों को मधुर स्वर में हरदम गाती है
तुम रिझो अब राग बसन्त में शबनम गाती है
“शबनम”बन गई योजन तेरी
मुझको पास बुलाओ
अपनी बंसी के धुन पर तुम
मुझे भी तो नाचवाओ
तेरे रहने की ख़ुशी में ही मैं गीत सुगम गाती है
तुम रिझो अब राग बसन्त में शबनम गाती है
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पागल
प्यार में इतने कैसे छल हो गए
जो मित्र थे शत्रु सकल हो गए
उनको अब ऐसा लगता क्यों है
प्यार में उनके पागल हो गए
जीत ली हमने आखिरी बाजी
अपने मकसद में सफल हो गए
एक जरा कृष्ण ने नजर फेरी
झोपड़ी सुदामा के महल हो गए
आपके आते ही शबनम उनकी
सारी समस्याओं के हल हो गए
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बेटी
एक दिन बेटी चल देती , पिता के घर को छोड़
एक अनजाने पति के संग में अपना नाता जोड़
मिलना मिलाना दो दिल का ही होता शुभ विवाह
बंध कर रीति के बंधन में संग खेते जीवन नाव
चाहे जवानी लेकर आए कितने तेज बहाव
जीवन साथी मिल जाने से आता एक पड़ाव
दे दे ईश्वर हर बेटी को ऐसी ही ससुराल
जहाँ लक्ष्मी करे आरती लेकर दीपक थाल
सास मिले कोशल्या जैसी ससुर हो दशरथ तुल्य
पति और देवर राम लखन सा लव-जैसा लाल
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चंचल मन
चंचल मन न स्थिर होए दौड़े इट उत पार
इत नगरी है पाप की उत्त है तारन हार ।
रे मनवा करले स्वंय विचार,,,,
जगमग लगभग पाप की नगरी
एक दीप हरि द्वार
ये जगमग तो नरक दिखाए वो
करे बेड़ा पार
एक पर यम का दूत खड़ा है एक पर तारण हार
रे मनवा खुद ही करले विचार,,
स्वर्ण रजत की बात करेगा या हरि का संकीर्तन
मद्द कामिनी में रीझेगा या भगवान के दर्शन
एक द्वार तो नर्क को जाता दूजे हरि के द्वार
रे मनवा खुद से करले विचार
कंचन मन को गंदला मत कर
मत खो अपना विवेक
सत्य के पथ पर एक दिन बन जायेगा नेक
“शबनम”श्राप दे खुद को उनको होगा रे उद्धार
रे मनवा खुद ही कर ले विचार
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