शबनम मेहरोत्रा , कानपुर
सृजन की निरंतरता, मानवीय संवेदनाओं की विविधता और ईश्वर में अटूट विश्वास पर कविताएं
सारांश:
ये कविताएँ जीवन, सृजन, मानवीय संवेदनाओं और ईश्वर की भक्ति का अनोखा संगम हैं। इनमें संघर्ष की प्रेरणा, भावनाओं की गहराई और आस्था की शक्ति का अद्भुत मेल है, जो पाठक के हृदय को छू जाता है।आइए पढ़ें इनको विस्तार से—
सृजन
युग बीते नव सृजन की, फिर कितना गलत है कहना ।
जब तक मानव है धरती पर, सृजन नए नित करना ।
युग बीते संवत्सर बीते,बीते
कितने वर्ष ।
मानव ने सृजन न छोड़ा करते
रहा संघर्ष ।
सदा सदा से चलता रहा है ,सोच सोच क्या डरना l
सृजनहारों ने कर दी है इतनी,
पुस्तक रचना l
ज्ञानी विज्ञानी को भी मुश्किल ,
होगा सारा पढ़ना ।
कोशिश लाख करे हम फिर भी ,बड़ा कठिन सब पढ़ना ।
विद जन जैसे शबनम में न , है
ज्ञान भण्डार ।
मामूली कुछ शब्द पिरो कर ,
लिखती अपना विचार
अभी तो पहले पहल किया है ,प्रथम सोपान पे चढ़ना ।
जब तक मानव है धरती पर ,सृजन नए नित करना l
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भावना
जैसी भावना जगती है
वैसी कविता लिखतिःहूँ
कोई क्या समझे कोई क्या जाने
मेरे अंदर को कोई क्या माने
कभी खीज भरी कभी प्यार भरा
कुछ क्रोध भरा,व दुलार भरा
कभी प्रियतम मेरे रंगीले के
जो है मेरे छैल छबीले के
कभी रोटी भूख ग़रीबों की
कभी बहते खून पसीनो की
कभी बेकारी कभी कामों की
कभी खेत कभी खलिहानों की
कभी फूल ,कली और गंधों के
कभी उड़ते हुवे विहंगों के
मैं कविता रचती जाऊँ
जरा पास मैं उनके आऊँ
जिस कविता में रोटी नहीं
छोटी छोटी बेटी नहीं
अबला का बाजार न हो
यह घृणित व्यपार न हो
“शबन्नम ‘के कथन तौर ही है
वह कविता नहीं कुछ और ही है
वह कविता नहीं कुछ और ही है।
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ईश्वर
आदम मनु की हो गए हम ऐसी संतान
जिनके कर्म देख के छुप गए है भगवान
क्या पहले भगवान को हुआ न अनुमान
मानव रूप में बन गए ये सारे ये शैतान
भाई भाई का कैसे देखो काट रहा है गला
इतना कैसे हो गया है पत्थर दिल इंसान
दया भलाई परोपकार का भूल गए है शब्द
सभी लगे है खुद करने अपना ही कल्याण
स्वार्थ में डूबी जहाँ देख कर जीना हुआ मुहाल
शबनम इस दुनियाँ से ईश्वर माँग रही है त्रान