“प्रेम, भक्ति और मातृभूमि का संगम – जीवन का सजीव काव्य”
पंकज शर्मा “तरुण “, मंदसौर (म. प्र.)
सारांश :
इन कविताओं में मातृभूमि के प्रति प्रेम, भक्ति का मधुर स्वर, जीवन-दर्शन और प्रेम की भावनाएँ अभिव्यक्त हुई हैं।
देशभक्ति की ऊष्मा, सौंदर्य की सरसता और अध्यात्म की गहराई – सब मिलकर एक सम्पूर्ण काव्य-यात्रा का निर्माण करते हैं। ये कविताएं हमें मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों और संस्कृति की अमूल्य झलक दिखाती हैं। आइए इनका खुले मन से रसास्वादन करें—
जन्मभूमि
नदी रक्त की बहने लगती,जब वे करते सीमा पार।
शस्त्र स्वचलित लिए हाथों में,ध्वस्त कर रहे सब आधार।।
मानवता पर ग्रहण लगाते,देख रहे चुप सारे देश।
आग में घी सब डालते हैं,खत्म न होने देते क्लेश।
आतंकी पहले पाकी थे,अब ढाका निकला गद्दार।
नदी रक्त की बहने लगती….
जले पड़ोसी भारत के सब,देख तरक्की का अभियान।
दुनिया सारी भोंचक्की है, देती भर भर कर सम्मान।।
मजहब को यह ढाल बनाते,कैसे हमें करें स्वीकार।।
नदी रक्त की बहने लगती…..
जन्म भूमि यह है गौतम की,कृष्ण गए सिखला कर प्यार।
जिनके दिखलाए पथ पर अब,चलने को आतुर संसार।
सभी विधर्मी देश बने हैं,सुख की राहों में अब खार।।
नदी रक्त की बहने लगती,जब वे करते सीमा पार।
शस्त्र स्वचलित लिए हाथों में,ध्वस्त कर रहे सब आधार।।
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नेह
नेह करो निज देश से,निर्मल रख कर भाव।
यह विशाल वट वृक्ष सम,देता शीतल छांव।।
जन्म भूमि है स्वर्ग सी, अन्न रत्न की खान।
सब की यह है मां धरा, हम इसकी संतान।।
सघन वनों का है कवच,है जीवन की शान।
प्राण वायु निःशुल्क दें,यह मौलिक वरदान।।
सिंह हिरण गज साथ में, रहते हैं खुशहाल।
झरने सरिता गा रही,मिला सुरों से ताल।।
राग रंग सब भिन्न हैं,भिन्न सभी परिवेश।
सबसे सुंदर एक यह,अपना भारत देश।।
राम कृष्ण गौतम हुए,इस माटी के लाल।
इसी लिए संसार में, उन्नत भारत भाल।।
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अदाएं
चंचल शोख अदाएं तेरी,देख प्यार आ जाता है।
मधुर सदाएं सुन कर तेरी,नशा मुझे आ जाता है।।
बासंती फूलों सी खुशबू,नित्य लटो में रहती है।
तेज चांद सम मुख पर चमके,चांदनी सी दमकती है।।
कितनी तेरी तारीफ करूं,नहीं समझ में आता है।
चंचल शोख अदाएं तेरी, देख प्यार आ जाता है।।
मृग नयनी कंचन काया यह,नाम हमारे कर दो ना।
खुशियों के सागर सारे अब,नाम हमारे कर दो ना।।
एक झलक जो देखे कोई,मन प्रफुल्ल हो जाता है।
चंचल शोख अदाएं तेरी, देख प्यार आ जाता है।।
तरुण केश काले बादल से,रिमझिम वर्षा करते हैं।
देख फरिश्ते आसमान से,तुझ पर जान छिड़कते हैं।।
बांधो इनको नाग पाश में,मन मेरा डर जाता है।
चंचल शोख अदाएं तेरी,देख प्यार आ जाता है।
मधुर सदाएं सुन कर तेरी,नशा मुझे आ जाता है।।
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घूंघट
नित रिश्ते, घूंघट पट खोले।
राम नाम नित सांसें बोले।।
ब्रह्म नाद जब बजती प्यारी।
कानों में ज्यों मिश्री घोले।।
नैनों में जब सूरज निकले।
हो उजियारा होले होले।।
शांत हो रहा है अंतर्मन।
जो दर्शन के धधके शोले।।
धूनी सतत जले नित अंदर।
चाहे मत पहनो तुम चोले।।
बोलो बजा बजा कर डमरू।
बम बम भोले बम बम भोले।।
लगा त्रिवेणी में चल डुबकी।
पाप किए जो सारे धोले।।
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दोहे
पतझड़ दुख सम भागता,सुन आया ऋतुराज।
सुन कर इस संदेश को, झंकृत मन के साज।।
झूम उठे मधुकर तरुण, गुन- गुन गाते गीत।
कलियों पर मंडरा रहे, बन जाने को मीत।।
आत्मा का बल हो कवच, मिलती निश्चित जीत।
खुद से अच्छा है कहाँ, कोई अपना मीत।।
सरिता को अपशिष्ट से,करें न मैली तात।
जीवन रेखा है रखें, सुखदाई अनुपात।।
निज स्वभाव ऐसा रखें, जैसे होता सूप।
मन भावन सबको लगें,ज्यों सर्दी की धूप।।
बदली- बदली है पवन, हुई तेज भी धूप।
सूरज धरती के निकट,आकर बदले रूप।।
भंवर लाल नेता हुए, पाते बहु सम्मान।
मगर नहीं यह जानते, कैसे बना विधान।।