सुशीला तिवारी , पश्चिम गांव ,रायबरेली
सावन की फुहारें और दिल की पुकार – क्या लौटोगे पिया अपने घर?
सारांश:
सावन का महीना हो और पिया परदेश में – दिल की तड़प हर बूँद में महसूस होती है। सुशीला तिवारी की कविताएँ विरह की वेदना और सच्चे प्रेम की कसक को इतनी सहजता से बयां करती हैं कि दिल छू जाती हैं।
क्या आप भी किसी को यूँ ही याद करते है? आइए जानें इन रचनाओं से-
सावन का महीना
ये सावन का महीना,पिया है परदेश ।
चिट्ठी लिख भेजा,आ जाओ अपने देश ।।
चलती नशीली हवा यह पुरवाई,
धीर, धरें कैसे कुछ समझ न पाई,
निंदिया नही आवे,काटन को दौड़े सेज ।
चिट्ठी लिख भेजा,आ जाओ अपने देश ।।
कैसे कटे सावन तुम बिन साजन,
बैरी पपीहा बोले जले ये तन मन,
गरजे ,बरसे बादल हरियाली छाई खेत ।
चिट्ठी लिख भेजा ,आ जाओ अपने देश ।।
दिल ले गये हो, चित चोर कहाये,
सबसे सजन आये एक तुम न आये,
कब तक है घर आना,संदेशा कोई भेज ।
चिट्ठी लिख भेजा,आ जाओ अपने देश ।।
चूड़ी हरी लाना ,और लाना कंगनवा,
तुम बिन कहीं मन लागे न सजनवा,
देखे राह”सुशीला”पिया आकर यहाँ देख ।
चिट्ठी लिख भेजा,आ जाओ अपने देश ।।
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पता कीजिए
मुहब्बत में क्यूँ करते,किनारे पता कीजिए,
एक पल न उन बिन ,,गुजारे पता कीजिए ।
बहुत सी कतारें लगी, थी रेस ज़िन्दगी की,
हुई जीत किसकी, कौन हारे पता कीजिए ।
ऐसा कोई एक हमसफ़र,हमदम हो हमारा,
उल्फत से उलझी लट ,,संवारे पता कीजिए ।
भले ही तुम हमसे करते रहे बेवफाई हमेंशा,
सदा से वफादार थे हम तुम्हारे पता कीजिए ।
जब चलते रहे तुम चाल पर चाल हरदम,
कहाँ जीत कर फिर से ,,,,,हारे पता कीजिए ।
कभी प्यार में साथ उनके गुजारे जो लम्हे,
वजह क्या हुई सबकुछ,बिसारे पता कीजिए।
तुमने तो अपना बना लिया है आशियाना,
अभी तक रहे मेरे अरमाँ कुंवारे पता कीजिए।
ये लहराती जुल्फें”सुशीला”खामोशी लबों पर,
यही चाह निकले दिल से,हमारे पता कीजिए।
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Really liked the poems