“नारी सौंदर्य, प्रकृति की गहराई और परिंदों की आज़ादी—जीवन के तीन रंग।”
उत्तम कुमार तिवारी ” उत्तम ” लखनऊ
सारांश :
ये कविताएं स्त्री की कोमलता और मातृत्व, बारिश की बूँदों की यात्रा, और परिंदों की उड़ान के माध्यम से जीवन के विविध रंगों को दर्शाती हैं।। हर कविता में भावनाओं का एक नया आयाम खुलता है—कभी प्रेम, कभी प्रकृति, कभी स्वतंत्रता। ये रचनाएँ जीवन, सौंदर्य और आशा के अद्भुत संगम का प्रतीक हैं। आइए इनका पठन करें ताकि मन प्रफुल्लित हो जाए—
खिली हुई तुम
खिली हुई तुम कली की जैसी
खुशबू तेरी चम्पा जैसी ।
आँख तुम्हारी नील सरोवर
वेणी तेरी लता की जैसी ।।
बाल खुले तो बदरी जैसी
लहराये तो नागिन जैसी ।
बोली तेरी कोयल जैसी
चितवन तेरी हिरणी जैसी ।।
आँख तुम्हारी कजरारी
लट तेरी है घूँघराली ।
कमर तुम्हारी है सुराही
चाल चले तू मतवाली ।।
धर्म कर्म मे सदा अग्रणी
सती सावित्री सीता जैसी
ममता की तू मूरत है
माता तू यशुमति की जैसी ।।
नित्य करूँ मै पूजा तेरी
सदा पूजनीय तू देवी जैसी ।
उत्तम की तू आराध्या
राधा और रुक्मणि जैसी ।।
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बूँदे
बारिश की बूँदे
समंदर समाई ।
नदियों मे गिर कर
लहरे बनाई ।।
गिरी बूँद सीपो मे
मोती बनी
अगूंठी मे जड़ कर
शोभा बढ़ाई ।।
गिरी बूँद पत्तों पर
मोती सी लगी
वही बूँद गिर कर
धरती मे समाई ।।
पपीहा तड़फता रहा
प्यास से
स्वाती की बूँदो से
प्यास बुझाई ।।
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परिंदे
हमको उड़ना कौन सिखाएगा
हम तो परिंदे है आसमानो के ।
ये धरती ,अम्बर ये नदिया समंदर
नाप कर उड़ चला आसमानो मे ।।
हमने सूरज से मिलने को ठानी थी
लुटा दी हमने अपनी जवानी थी ।
जरे पंख मेरे गिरा मै धरा पर
ये मेरी कहानी थी ये मेरी कहानी थी ।।
हमे किसने रोका कहाँ हमको जाना
जिधऱ मन चला उधर उड़ के है जाना ।
मै आज़ाद हूँ परिंदा अपने वतन का
उडू मै कही भी वतन को है आना ।।
मेरा भी अपना है सुन्दर ठिकाना
अपने ठिकाने मे रात बिताना ।
कही पेड़ की डाल कही दरखतो मे
मेरा ठिकाना है मेरा ठिकाना ।।
मुझे भी बच्चो को उड़ना सिखाना
उन्हे आसमानो मे लेकर है जाना ।
खुलेंगे पँख वो भी उड़ेंगे
मेरे साथ उनका भी है आना जाना ।।
One Comment
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बादल पे पांव, उड़ चला परिंदा ना जाने किस्से मिलने।